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श्री महावीर हॉस्पिटल की बड़ी लापरवाही बेनकाब : बिना पंजीयन और अनुमति के चल रही थी न्यूरोसर्जरी, फर्जी डॉक्टर के हाथ में थी आईसीयू की कमान….

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हिंद स्वराष्ट्र अम्बिकापुर : माननीय उच्च न्यायालय, बिलासपुर के निर्देश पर जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग द्वारा अम्बिकापुर के श्री महावीर हॉस्पिटल (गांधीनगर) पर की गई औचक जांच ने निजी चिकित्सा जगत में हड़कंप मचा दिया है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) कार्यालय द्वारा 17 अक्टूबर 2026 को जारी जांच प्रतिवेदन ने अस्पताल प्रबंधन के उन काले कारनामों से पर्दा उठाया है, जो सीधे तौर पर मरीजों की जिंदगी के साथ खुला खिलवाड़ कर रहे हैं। इस सनसनीखेज रिपोर्ट में बिना पंजीयन और अनुमति के जटिल न्यूरोसर्जरी किए जाने का मामला सबसे प्रमुखता से सामने आया है।

1. सबसे बड़ा मुद्दा: बिना अनुमति और पूर्व पंजीयन के धड़ल्ले से हुई न्यूरोसर्जरी

जांच रिपोर्ट के अनुसार, श्री महावीर हॉस्पिटल में डॉ. चंदन दुबे (M.Ch. न्यूरोसर्जरी) की सेवाएं ली जा रही थीं, जिसकी स्थापना या कार्य लिए जाने की कोई भी अनिवार्य सूचना सीएमएचओ कार्यालय को नहीं दी गई थी। छत्तीसगढ़ राज्य उपचर्यागृह तथा रोगोपचार संबंधी स्थापनाएं अनुज्ञापन अधिनियम (नर्सिंग होम एक्ट) के नियमों का यह खुला उल्लंघन है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल द्वारा डॉ. चंदन दुबे को 08 अक्टूबर 2026 को प्रोविजनल पंजीयन जारी किया गया था, जबकि अस्पताल प्रबंधन ने अपने लिखित जवाब में यह स्वीकार किया है कि डॉ. दुबे द्वारा इससे लगभग चार महीने पहले यानी 13 जून 2026 को ही अस्पताल में एक मरीज की गंभीर न्यूरोसर्जरी को अंजाम दे दिया गया था। बिना वैध पंजीयन और प्रशासनिक अनुमति के इस तरह की हाई-रिस्क सर्जरी करना अस्पताल प्रबंधन की घोर लापरवाही और गैर-कानूनी कृत्य को उजागर करता है।

2. फर्जी डिग्री वाले ‘डॉ. नुरूल आलम’ के भरोसे थी आईसीयू के मरीजों की सांसें

जांच दल की यह खोज बेहद डरावनी है कि अस्पताल में कार्यरत डॉ. नुरूल आलम की डिग्री ही फर्जी पाई गई। इसके बावजूद उन्हें अस्पताल के सबसे संवेदनशील और जीवन-रक्षक विभाग यानी आईसीयू (ICU) का प्रभार सौंपा गया था। पिछले कुछ वर्षों से बिना किसी वैध और सत्यापित डिग्री के वे मरीजों का इलाज कर रहे थे, जो सीधे तौर पर मासूम मरीजों की जान के साथ क्रूर मजाक है।

3. आयुष्मान योजना के नाम पर मरीज से अवैध वसूली

रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ है कि सड़क दुर्घटना में घायल स्व. आशुतोष दास, जिनका इलाज आयुष्मान योजना के तहत पूरी तरह निःशुल्क होना था, उनसे अस्पताल प्रबंधन द्वारा आयुष्मान नियमों के विरुद्ध 87,300/- (सत्तासी हजार तीन सौ रुपये) नगद राशि वसूल की गई।

4. लैब में बड़ा फर्जीवाड़ा और बिना पंजीयन स्टाफ

  • अस्पताल प्रबंधन द्वारा ‘स्माल लैब’ (छोटे लैब) का पंजीयन कराकर वहां बड़े पैमाने पर ‘लार्ज लैब’ का अवैध संचालन किया जा रहा था, जिस पर जांच टीम ने बड़ी मशीनों को तुरंत बंद कराया।
  • गंभीर बात यह है कि लैब रिपोर्ट पर पैथोलॉजिस्ट के असली हस्ताक्षर के बजाय रबर सील (मोहर) लगाकर मरीजों को थमाई जा रही थी।
  • लैब में कार्यरत लैब तकनीशियन सुमन राजवाड़े भी बिना किसी वैध पंजीयन के कार्य करते पाए गए।
  • इसके अलावा, अस्पताल के अन्य चिकित्सकीय एवं पैरामेडिकल स्टाफ के पास भी शासन द्वारा अनिवार्य पैरामेडिकल काउंसिल का पंजीयन नहीं मिला।

उच्च न्यायालय के निर्देश पर खुली पोल

यह विस्तृत जांच डॉ. पी.के. सिन्हा (नोडल अधिकारी, नर्सिंग होम एक्ट), डॉ. स्मिता परतवार (नोडल अधिकारी, आयुष्मान भारत) सहित स्वास्थ्य विभाग, नगर निगम और प्रशासनिक अधिकारियों के एक उच्चस्तरीय जांच दल द्वारा की गई है।
अब देखना यह होगा कि बिना अनुमति न्यूरोसर्जरी करने, फर्जी डॉक्टरों से इलाज करवाने और मरीजों को लूटने वाले इस अस्पताल पर जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग क्या कड़ी कार्रवाई करता है।

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