महाघोटाला: संभाग में बिना मान्यता के चल रहे पैरामेडिकल कॉलेज, ‘सांध्य’, ‘लिली’ और ‘केपी’ जैसे संस्थान मासूम छात्रों के भविष्य से कर रहे खिलवाड़!

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हिंद स्वराष्ट्र अम्बिकापुर : एक तरफ सरकार युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने और स्वास्थ्य क्षेत्र में बेहतर भविष्य देने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी तरफ हमारे ही संभाग में शिक्षा और करियर के नाम पर ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ का खेल चल रहा है। संभाग में बिना किसी वैध मान्यता और रजिस्ट्रेशन के धड़ल्ले से कई पैरामेडिकल कॉलेज संचालित हो रहे हैं, जो सीधे तौर पर हजारों मासूम छात्र-छात्राओं के भविष्य को अंधकार में धकेल रहे हैं।
इस गोरखधंधे में सांध्य पैरामेडिकल, लिली ऑर्गेनाइजेशन और केपी पैरामेडिकल जैसे कई संस्थानों के नाम प्रमुखता से सामने आ रहे हैं, जो बिना किसी डर के खुलेआम ‘डिग्री और डिप्लोमा’ बांटने की दुकान खोलकर बैठे हैं।
चकाचौंध वाले विज्ञापन, अंदर सिर्फ खोखलापन
यदि आप शहर की सड़कों पर निकलें, तो आपको दीवारों, चौराहों और बिजली के खंभों पर बड़े-बड़े पोस्टर और चमचमाते विज्ञापन देखने को मिल जाएंगे। इन विज्ञापनों में 100% जॉब गारंटी, बेहतरीन लैब और शानदार करियर के सुनहरे सपने दिखाए जाते हैं। ग्रामीण और मध्यमवर्गीय परिवारों के भोले-भाले बच्चे इन पोस्टरों के झांसे में आकर लाखों रुपये की फीस जमा कर देते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि इन संस्थानों के पास न तो स्वास्थ्य विभाग की वैध अनुमति है और न ही पैरामेडिकल काउंसिल की मान्यता। छात्रों को जो डिग्रियां थमाई जा रही हैं, वे महज़ रद्दी का टुकड़ा हैं, जिनके आधार पर कभी कोई सरकारी या प्राइवेट नौकरी नहीं मिल सकती।
“हमारा पैसा और समय दोनों बर्बाद हो गया। जब हम काउंसिल में रजिस्ट्रेशन कराने की बात करते हैं, तो कॉलेज प्रबंधन गोलमोल जवाब देता है। प्रशासन को सब पता है, फिर भी कोई कार्रवाई नहीं हो रही।”
नाम न छापने की शर्त पर एक पीड़ित छात्र


बार-बार शिकायतें, फिर भी कुंभकर्णी नींद में सोया प्रशासन!
इस पूरे मामले में सबसे शर्मनाक और हैरान करने वाली भूमिका स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की रही है। जागरूक नागरिकों और ठगे गए छात्रों द्वारा इस धोखाधड़ी के खिलाफ बार-बार लिखित शिकायतें दर्ज कराई जा चुकी हैं। साक्ष्यों के साथ बताया गया है कि कैसे ये कॉलेज नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं।
लेकिन प्रशासनिक सुस्ती का आलम यह है कि अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही। शिकायतों की फाइलें दफ्तरों में धूल खा रही हैं।

प्रशासन की इस रहस्यमयी चुप्पी और सुस्ती ने अब कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
क्या इन अवैध संस्थानों को किसी बड़े रसूखदार या राजनेता का संरक्षण प्राप्त है?
क्या स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन किसी बड़े हादसे या छात्रों के उग्र आंदोलन का इंतज़ार कर रहा है?
शहर के चप्पे-चप्पे पर लगे अवैध विज्ञापनों पर नगर निगम और प्रशासन की नज़र क्यों नहीं पड़ती?

करियर तबाह, ज़िम्मेदार कौन?
पैरामेडिकल का क्षेत्र सीधे तौर पर लोगों की जान से जुड़ा हुआ है। बिना मान्यता और बिना उचित ट्रेनिंग के तैयार होने वाले ये छात्र कल को अस्पतालों में क्या सेवाएं देंगे? यह न सिर्फ छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है, बल्कि आम जनता की सेहत के साथ भी एक बड़ा आपराधिक कृत्य है। लाखों रुपये कर्ज लेकर बच्चों को पढ़ाने वाले माता-पिता आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
सांध्य पैरामेडिकल, लिली ऑर्गेनाइजेशन और केपी पैरामेडिकल जैसे संस्थानों पर तत्काल ताला लगना चाहिए और इनके संचालकों पर धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज होना चाहिए। अगर प्रशासन अब भी नहीं जागा, तो युवाओं का सिस्टम पर से भरोसा उठ जाएगा।

ब्यूरो रिपोर्ट: अब देखना यह होगा कि इस ख़बर के बाद क्या प्रशासनिक अमला अपनी कुंभकर्णी नींद से जागता है, या फिर चंद रुपयों और रसूख के दम पर बच्चों के भविष्य की यह ‘सौदागरी’ यूँ ही सड़कों पर पोस्टर चमकाती रहेगी।

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