अम्बिकापुर राजस्व विभाग की नाक के नीचे राष्ट्रपति के दत्तक पुत्रों की जमीन पर डाका: न्यायालय में चल रहा था केस, फिर भी कर दी रजिस्ट्री और नामांतरण—बिना मिलीभगत कैसे हुआ खेल?

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हिंद स्वराष्ट्र अम्बिकापुर। छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल से एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है जिसने सूबे के राजस्व महकमे और कानून व्यवस्था की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। देश के सर्वोच्च पद यानी राष्ट्रपति के “दत्तक पुत्र” कहे जाने वाले विशेष संरक्षित पहाड़ी कोरवा जनजाति के आदिवासियों की जमीनों पर भू-माफियाओं का शिकंजा कसता जा रहा है। शासन-प्रशासन के चौखट पर सिर पटक कर थक चुके इन आदिवासियों की सुध लेने वाला कोई नहीं है, जबकि दूसरी तरफ भू-माफिया और रसूखदार लोग नियमों को ठेंगा दिखाकर उनकी जमीनों पर आलीशान आशियाने खड़े कर रहे हैं।

स्टे के बावजूद धड़ल्ले से निर्माण, प्रशासन मौन

पीड़ित कोरवा जनजाति के ग्रामीण सुग्गी कोरवा आत्मज सोमार साय कोरवा का आरोप है कि मुस्लिम समुदाय के रसूखदार व्यक्ति अब्दुल जली मिरकली द्वारा उसकी जमीनों पर अनधिकृत कब्जा किया गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे मामले पर न्यायालय का ‘स्टे’ (स्थगन आदेश) होने के बावजूद वहां न केवल निर्माण कार्य किया गया, बल्कि अब कई नए मकान बनकर तैयार हो चुके हैं। प्रशासन की इस कथित “मौन सहमति” ने भू-माफियाओं के हौसले इतने बुलंद कर दिए हैं कि वे लगातार अपने पैर फैलाते जा रहे हैं।

स्थगन आदेश

‘हिंद स्वराष्ट्र’ की दखल के बाद खुला खेल: 170 (ख) के बीच नामांतरण का ‘खेल’

इस पूरे मामले का सबसे स्याह और गंभीर पहलू तब सामने आया जब ‘हिंद स्वराष्ट्र’ समाचार पत्र/संगठन की दखल के बाद कांतिप्रकासपुर के इस विवादित भूमि खसरा नंबर 527 पर आदिवासियों के संरक्षण से जुड़ी धारा 170 (ख) का प्रकरण 27/07/2022 को दर्ज किया गया।
जब यह मामला अनुविभागीय अधिकारी (SDM) न्यायालय अंबिकापुर में विचाराधीन था, ठीक उसी दौरान एक ऐसा ‘चमत्कार’ हुआ जो बिना उच्च स्तरीय मिलीभगत के कतई संभव नहीं है:

  1. विचाराधीन मामले के दौरान बिक्री: जिस व्यक्ति भुनेश्वर प्रसाद आत्मज मुरलीधर गोड़ के खिलाफ 170 (ख) के तहत आदिवासी जमीन हड़पने का केस चल रहा था, उसने धड़ल्ले से उस विवादित जमीन की रजिस्ट्री 25/01/2023 को धरम साय बखला आत्मज मंगरू राम के नाम कर दी और उसका नामांतरण भी कर दिया गया।
  2. राजस्व अधिकारियों की मेहरबानी: राजस्व विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों ने बिना किसी जांच-पड़ताल या जानबूझकर आंखें मूंदते हुए, उस विवादित जमीन का नामांतरण (Mutation) भी मंजूर कर दिया।

बड़ा सवाल: क्या बिना अधिकारियों की साठगांठ के यह मुमकिन है?

कानूनन, जब किसी जमीन पर धारा 170 (ख) का मामला दर्ज हो और वह SDM कोर्ट में लंबित हो, तो उस जमीन की न तो खरीद-बिक्री हो सकती है और न ही नामांतरण। ऐसे में यह यक्ष प्रश्न खड़ा होता है:

“क्या किसी पटवारी, तहसीलदार या राजस्व अधिकारी की मिलीभगत और मोटी साठगांठ के बिना एक प्रतिबंधित और विचाराधीन आदिवासी जमीन का नामांतरण कलेक्ट्रेट की नाक के नीचे होना संभव है?”

जवाब साफ है—यह सीधे तौर पर भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग का मामला है, जहां चंद रुपयों और रसूख के आगे राष्ट्रपति के दत्तक पुत्रों के अधिकारों की बलि चढ़ा दी गई।

‘दत्तक पुत्रों’ के संवैधानिक अधिकारों का हनन

भारतीय संविधान में पहाड़ी कोरवा जैसी अत्यंत पिछड़ी जनजातियों को विशेष संरक्षण प्राप्त है। उन्हें राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र माना जाता है ताकि कोई उनकी जमीन और अस्मिता से खिलवाड़ न कर सके। लेकिन अम्बिकापुर का यह जमीनी सच बयां कर रहा है कि कागजी संरक्षण और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर है। आज ये ग्रामीण अपनी ही जमीन से बेदखल होकर दर-दर भटकने को मजबूर हैं, और उनके हक पर भू-माफिया अवैध निर्माण कर जश्न मना रहे हैं।
अब देखना यह है कि इस गंभीर मामले के उजागर होने के बाद सरगुजा संभाग के आला अधिकारी और शासन इस पर क्या संज्ञान लेते हैं। क्या दोषी राजस्व अधिकारियों और भू-माफियाओं पर कड़ी कार्रवाई होगी, या फिर ये बेबस आदिवासी यूं ही व्यवस्था के हाथों प्रताड़ित होते रहेंगे?

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