सिस्टम का ‘सरेंडर’: करोड़ों के दवा घोटाले में जांच रिपोर्ट धूल फांक रही, SDM पति डॉ. आयुष जायसवाल को बचाने में जुटा पूरा महकमा!

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हिंद स्वराष्ट्र अंबिकापुर: सरगुजा जिले के नवापारा शहरी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में हुए करोड़ों रुपये के दवा घोटाले ने प्रशासनिक ईमानदारी की पोल खोल कर रख दी है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) के निर्देश पर गठित सात सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच समिति ने घोटाले की पुष्टि कर दी है, लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी अब तक कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं हुई है।
पूरे जिले में अब यह सवाल गूंज रहा है कि क्या अंबिकापुर का प्रशासन एक SDM के रसूख के आगे नतमस्तक हो गया है? इस पूरे गबन कांड में वर्ष 2024-25 के दौरान क्रय प्रभारी चिकित्सा अधिकारी रहे डॉ. आयुष जायसवाल की भूमिका सवालों के घेरे में है, जो वर्तमान में सूरजपुर एसडीएम शिवानी जायसवाल के पति हैं।


अधिकारियों की मेज पर पड़े हैं ये ‘काले चिठ्ठे’, फिर भी कार्रवाई शून्य
जांच समिति (जिसमें डॉ. वाई. के. किण्डो, डॉ. पी. के. सिन्हा जैसे वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे) की रिपोर्ट चीख-चीख कर कह रही है कि सरकारी खजाने को किस तरह लूटा गया:
रिपोर्ट में साफ लिखा है कि जब वर्ष 2019-2020 से 2024 तक के खरीदी दस्तावेज मांगे गए, तो बताया गया कि पिछले वर्ष कार्यालय में आग लगने से सभी रिकॉर्ड जल गए हैं। क्या यह महज एक हादसा था या करोड़ों का गबन छिपाने की सोची-समझी साजिश?
बिना ‘रेट’ के लाखों की खरीदी: वित्तीय वर्ष 2024-25 में दवाओं और उपकरणों की खरीदी के लिए जो नोटशीट बनाई गई, उसमें दर (Rate) का उल्लेख ही नहीं किया गया और बिना रेट तय किए ही 2 से 3 लाख रुपये के क्रय आदेश जारी कर दिए गए।
नियमों की सरेआम धज्जियां:  सीमित निविदा (कोटेशन) के बजाय एक ही फर्म को एक दिन में 50,000 रुपये के कई ऑर्डर देकर सिंगल टेंडर के माध्यम से भ्रष्टाचार किया गया।
कैंसर की दवाओं में भी खेल: कीमोथेरेपी जैसी गंभीर बीमारी की दवाओं के लिए CGMSCL से अनिवार्य अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) तक नहीं लिया गया और संबंधित चिकित्सक द्वारा अपने ही नाम पर दवाएं इश्यू दिखाकर खर्च बता दिया गया।
गायब स्टॉक: जो दवाएं खरीदी गईं, स्टॉक रजिस्टर में उनकी एंट्री स्पष्ट नहीं है और वार्डों में बांटी गई दवाओं के रिकॉर्ड से इसका कोई मिलान नहीं हो रहा है।
अयोग्य कर्मचारियों से काम: फार्मासिस्ट अधिनियम 1948 का उल्लंघन करते हुए अधिकांश औषधियों और सामग्रियों का क्रय एक क्लर्क/सहायक ग्रेड-3 के द्वारा करवाया गया।
प्रशासन की चुप्पी: मजबूरी या मिलीभगत?
जांच समिति ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट और जांच प्रतिवेदन अधिकारियों को सौंप दिया है। सवाल यह है कि जब गबन, दस्तावेजों को खुर्द-बुर्द करने और सरकारी निय1मों के सीधे उल्लंघन के लिखित प्रमाण मौजूद हैं, तो अब तक FIR दर्ज क्यों नहीं की गई?
क्या स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन केवल इसलिए मौन साधे हुए है क्योंकि मुख्य आरोपी डॉ. आयुष जायसवाल के पास ‘SDM शिवानी जायसवाल के पति’ होने का प्रशासनिक कवच है? अगर कोई आम कर्मचारी इस तरह करोड़ों रुपये का हिसाब नहीं दे पाता और फाइलें जलने का बहाना बनाता, तो क्या प्रशासन तब भी इतना ही ‘दयालु’ रहता?
अंबिकापुर की जनता और आरटीआई कार्यकर्ता अब सीधे कलेक्टर और स्वास्थ्य मंत्री से जवाब मांग रहे हैं। जांच रिपोर्ट आने के बाद भी कार्रवाई न होना, न केवल भ्रष्टाचार को संरक्षण देना है, बल्कि आम जनता के विश्वास के साथ सबसे बड़ा धोखा है। प्रशासन को यह तय करना होगा कि वह न्याय के साथ खड़ा है या रसूखदारों के साथ।

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