“रिश्तेदारी के आगे झुका कानून? सूरजपुर जमीन घोटाले में नया मोड़! चाचा को बचाने SDM भतीजी ने की ‘सेटिंग’?

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हिंद स्वराष्ट्र सूरजपुर : लटोरी तहसील में हुए बहुचर्चित जमीन घोटाले में अब एक ऐसा पारिवारिक मोड़ आ गया है, जिसने एसडीएम शिवानी जायसवाल की पूरी जांच रिपोर्ट को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। ‘हिंद स्वराष्ट्र’ समाचार पत्र में प्रकाशित कड़ियों (पार्ट 1, 2, 3) के बाद जिस जांच का जिम्मा एसडीएम को सौंपा गया था, उसमें उन्होंने ‘चुन-चुन कर’ केवल उन्हीं मामलों को संज्ञान में लिया जो अभी लंबित थे। लेकिन असली खेल उन तीन मामलों में हुआ जिन्हें एसडीएम ने अपनी जांच की परिधि से बाहर रखा।
जांच में ‘पिक एंड चूज’ का खेल: तीन मामले गायब क्यों?
दस्तावेजों और सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, ‘हिंद स्वराष्ट्र’ ने लटोरी तहसीलदार के कई कारनामों का खुलासा किया था। लेकिन एसडीएम शिवानी जायसवाल ने केवल उन 3 खबरों पर नोटिस जारी किया जिनमें नामांतरण (Mutation) की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई थी या विवादित थी। 
सबसे बड़ा सवाल: उन बाकी 3 गंभीर मामलों को जांच में क्यों नहीं जोड़ा गया जिनमें नामांतरण की प्रक्रिया गुपचुप तरीके से पूर्ण कर ली गई थी? क्या उन फाइलों में दबे सफेदपोश चेहरों को बचाना एसडीएम की प्राथमिकता थी?
भतीजी बनी जज, तो ‘चाचा’ को मिली क्लीन चिट!
इस पूरे मामले की तह तक जाने पर जो सच सामने आया है, वह जिला प्रशासन की जड़ें हिला देने वाला है। चर्चा है कि जिन जमीनों की खरीद-बिक्री में नियमों को ताक पर रखा गया, उनमें से एक प्रमुख क्रेता (खरीददार) स्वयं एसडीएम शिवानी जायसवाल के चाचा बताए जा रहे हैं।
राजस्व विभाग के गलियारों में अब यह सवाल गूंज रहा है: “जब भतीजी ही जांच अधिकारी हो, तो चाचा पर कार्यवाही की उम्मीद कैसे की जा सकती है?”
हितों का टकराव (Conflict of Interest) और कानून की अवहेलना
कानूनी तौर पर यदि किसी जांच में अधिकारी का सगा संबंधी शामिल हो, तो उस अधिकारी को स्वयं को जांच से अलग कर लेना चाहिए। लेकिन यहाँ एसडीएम ने न केवल जांच की, बल्कि तहसीलदार को “सद्भाविक त्रुटि” का प्रमाण पत्र देकर मामले को रफा-दफा करने की पूरी कोशिश की। 
तहसीलदार का बचाव: एसडीएम ने रिपोर्ट में लिखा कि तहसीलदार ने जानबूझकर गलती नहीं की। 

सीमित जांच:

केवल खसरा नंबर 213/2, 421/2 और 114/1 तक ही जांच को सीमित रखा गया ताकि बाकी बड़े चेहरों तक आंच न पहुंचे। 
पत्रकार को बनाया निशाना, चाचा को बनाया सुरक्षित
हैरानी की बात है कि जांच रिपोर्ट में भ्रष्टाचार पर बात करने के बजाय, तहसीलदार के उस बयान को तवज्जो दी गई जिसमें उन्होंने पत्रकार की नियत पर सवाल उठाए थे। यह स्पष्ट करता है कि प्रशासन का उद्देश्य सच का पता लगाना नहीं, बल्कि सच दिखाने वालों का मुंह बंद करना और अपने परिजनों को लाभ पहुंचाना था। 
अब गेंद कलेक्टर सूरजपुर के पाले में है: क्या एक ऐसी एसडीएम की जांच रिपोर्ट को स्वीकार किया जाएगा जिसका सीधा संबंध आरोपियों या लाभार्थियों से है? क्या इस मामले की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच होगी?

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