गोस्वामी तुलसीदास जयंती विशेष..

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आचार्य डॉ. अजय दीक्षित

राम बोलने वाले रामबोला जिनका नाम है।
उन हुलसी के तुलसी के चरणों में प्रणाम है।।

*जन मानस को सौंप गए*
*श्री राम चरित मानस,*

*साधना और सिद्धि जिनके*
*साक्षात श्री राम हैं।*

*गोस्वामी तुलसीदास जी अवतरण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं……*

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आप सभी को संत प्रवर श्री_गोस्वामी_तुलसीदास_जी_के_जन्ममहोत्सव_की_हार्दिक_शुभकामनाएँ!

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पँदरह सै चउवन बिषै, कालिंदी के तीर।
सावन सुकला सप्तमी, तुलसी धरेउ सरीर।।

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मन ऊपर सर जानिये, सर पर दीन्हें एक।

तुलसी प्रगटे रामवत, राम जनम की टेक।।

सुने गुरू से बीच सर , संत बीच मन गान।

प्रगटे सतहत्तर परे, ताते कहे चिरान।।

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अर्थात् १५५४ संवत् में श्रीगोस्वामी जी का जन्म हुआ और ५ वर्ष की अवस्था में अपने गुरु से श्रीरामकथा सुनी। पुनः दुबारा ४० वर्ष की अवस्था में वही कथा संत-मुख से सुनी। फिर उस कथा को ७७ वर्ष की अवस्था में भगवान् शिव की कृपा से संवत् १६३१ में प्रकट कर श्रीरामचरितमानस की रचना प्रारम्भ की।

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इसी से उसे भगवान् के यशरूपी जल का चिराना कहा जाता है। इसप्रकार १५५४ में ७७ जोड़ने पर संवत् १६३१ प्राप्त होता हैः

सादर सिवहि नाइ अब माथा।
बरनउँ बिसद राम गुन गाथा।।
संबत सोरह सै एकतीसा।
करउँ कथा हरि पद धरि सीसा।।
नौमी भौम बार मधुमासा।
अवधपुरीं यह चरित प्रकासा।।

-मानस १/३४/२-३

उस साल संवत् १६३१ के श्रीरामनवमी के दिन वैसा ही योग था जैसा त्रेतायुग में श्रीरामजन्म के दिन था। उस दिन प्रातःकाल गोस्वामी जी ने श्रीरामचरितमानस की रचना प्रारम्भ कर दी और २ वर्ष ७ माह २६ दिन में संवत् १६३३ के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष पंचमी(श्रीसीताराम विवाह-तिथि) के दिन ग्रंथ के सातों काण्डों की पूर्ति कर दी।

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श्रीनाभादास जी ने 🍁 भक्तमाल में इन्हें साक्षात् आदिकवि वाल्मीकि का अवतार कहा है-

कलि_कुटिल_जीव_निस्तार_हित_बालमीकि_तुलसी_भयो।’-

भक्तमाल छप्पय १२९

कविता करके तुलसी न लसे।
कविता लसी पा तुलसी की कला।।

-अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

“सचमुच वह कविता, वह रचना धन्य है जो स्वान्तःसुखाय बाबा तुलसी के हाथों रचकर सर्वजनहिताय-सर्वजनसुखाय बन गयी।”

बाबा तुलसी ने प्रभु श्रीसीताराम जी से जो माँगा, आज उनके जन्मोत्सव पर हम सब भी भगवान् से यही मंगलकामना करेंः–

मो_सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।

अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर।।

कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।

तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम।।
-श्रीरामचरितमानस ७/१३०(क)-१३०(ख)

“हे श्री रघुवीर! मेरे समान कोई दीन नहीं है और आपके समान कोई दीनों का हित करने वाला नहीं है। ऐसा विचार कर हे रघुवंशमणि! मेरे जन्म-मरण के भयानक दुःख का हरण कर लीजिए। जैसे कामी को स्त्री प्रिय लगती है और लोभी को जैसे धन प्यारा लगता है, वैसे ही हे रघुनाथजी। हे श्रीराम जी! आप भी मुझे निरंतर प्रिय लगिये।”

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रामभक्त सब मिलि करैं श्रीरघुवर अरदास।
जय जय सीताराम प्रभु जय श्री तुलसीदास।।

🌹आप सभी को सादर जय सियाराम जय जय हनुमान 🍁

आप सभी काः :-
आचार्य डा.अजय दीक्षित “अजय”

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