संपादकीय: शक्कर का संकट: नीतिगत दावों और किसान के दर्द के बीच पिसती मिठास…

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हिंद स्वराष्ट्र संपादक मृण्मयी पाण्डेय की कलम से…. देश में चीनी की कीमतों में हाल ही में हुई ₹15 से ₹20 प्रति किलो की बढ़ोतरी ने एक बार फिर सरकार की नीतियों और चीनी उद्योग के ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ जहां सरकार और मिल मालिक इसे E20 नीति (इथेनॉल ब्लेंडिंग), रेड रॉट बीमारी और अंतरराष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ाव का नतीजा बताकर पल्ला झाड़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में खड़ा किसान आज भी उपेक्षा और शोषण का शिकार है।
सरकारी आंकड़ों का तर्क है कि इथेनॉल के लिए गन्ने का डाइवर्जन घटकर 9% रह गया है और 20% इथेनॉल का अधिकांश हिस्सा मक्के जैसे अनाजों से बनाया जा रहा है। सरकार का यह भी दावा है कि इथेनॉल नीति से मिलों को तुरंत नकदी मिल रही है जिससे किसानों का भुगतान सुधरा है। लेकिन यह तस्वीर का सिर्फ एक-पक्षीय और कागजी हिस्सा है।
धरातल की कड़वी सच्चाई यह है कि गन्ने की खेती से किसानों का मोहभंग सरकार की गलत नीतियों और चीनी मिलों की मनमानी के कारण ही हुआ है। चीनी मिलों में गन्ने की तौल और खरीदी के लिए आज भी पारदर्शी और उचित व्यवस्थाओं का भारी अभाव है। कागजों पर भले ही 14 दिनों में भुगतान के नियम हों, लेकिन असलियत में किसानों को अपनी ही फसल के पैसों के लिए महीनों और कई बार सालों तक मिलों के चक्कर काटने पड़ते हैं। बोनस और बकाया एरियर (Arrears) का भुगतान तो इतना टलता है कि किसान कर्ज के जाल में उलझकर रह जाता है।
इसके अलावा, जिस गति से डीजल, खाद, कीटनाशक और मजदूरी के दाम बढ़े हैं, उस अनुपात में किसानों को उनकी फसल का उचित एवं लाभकारी मूल्य (FRP/SAP) कभी नहीं मिला। मिलों के लिए इथेनॉल से मुनाफा कमाना तो आसान कर दिया गया, लेकिन उस मुनाफे का वाजिब हकदार किसान आज भी अपने हक के लिए संघर्ष कर रहा है। जब किसान को समय पर दाम नहीं मिलता, तो वह गन्ने का रकबा घटाने को मजबूर होता है—और इसी सप्लाई गैप का खामियाजा अंततः आम उपभोक्ता को बढ़ी हुई कीमतों के रूप में भुगतना पड़ता है।
‘हिंद स्वराष्ट्र’ का स्पष्ट मानना है कि शक्कर के दाम में उछाल सिर्फ एक तात्कालिक बाजारी घटना नहीं है, बल्कि यह कृषि और औद्योगिक नीति के गहरे असंतुलन का नतीजा है। सरकार को महज स्टॉक लिमिट लगाने या आयात-निर्यात के अस्थायी पैबंद थामने के बजाय मिलों की जवाबदेही तय करनी होगी। जब तक तौल में पारदर्शिता, फसल का सही दाम और समय पर भुगतान की गारंटी नहीं होगी, तब तक न तो किसान खुशहाल होगा और न ही आम उपभोक्ता को महंगाई से स्थाई राहत मिलेगी।

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