हिंद स्वराष्ट्र सूरजपुर : सूरजपुर अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) एवं जन सूचना अधिकारी कार्यालय एक बार फिर गंभीर प्रशासनिक अनियमितताओं और कानून की मनमानी व्याख्या को लेकर सवालों के घेरे में है। मामला नवनिर्वाचित नगर पंचायत अध्यक्ष रितेश जायसवाल के अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) जाति प्रमाण पत्र से जुड़ा है। आरोप है कि राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर यह प्रमाण पत्र जारी किया गया, और अब जब इसकी जांच से जुड़ी जानकारी सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई, तो कानून के प्रावधानों को मरोड़कर जानकारी दबाने की कोशिश की जा रही है।
आखिर क्या था ‘गिरीश देशपांडे’ मामला और क्यों यहाँ लागू नहीं होता?
एसडीएम कार्यालय ने आरटीआई आवेदन खारिज करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध ‘गिरीश रामचंद्र देशपांडे बनाम केंद्रीय सूचना आयोग (2012)’ मामले का हवाला दिया है। लेकिन कानूनी जानकारों के मुताबिक, यह संदर्भ इस मामले पर बिल्कुल भी लागू नहीं होता। गिरीश देशपांडे मामले में एक नागरिक ने एक सरकारी कर्मचारी के निजी सर्विस रिकॉर्ड, मेमो, शो-कॉज नोटिस, इंकम टैक्स रिटर्न और निजी संपत्ति/देनदारियों का ब्योरा मांगा था। सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि किसी कर्मचारी का अपने विभाग के साथ निजी सर्विस रिकॉर्ड या इंकम टैक्स रिटर्न उसकी ‘व्यक्तिगत जानकारी’ (Personal Information) है और धारा 8(1)(j) के तहत सुरक्षित है।
यहाँ यह फैसला क्यों लागू नहीं होता?:
यहाँ मामला किसी सरकारी कर्मचारी की सैलरी या इंकम टैक्स का नहीं, बल्कि एक नवनिर्वाचित नगर पंचायत अध्यक्ष (जनप्रतिनिधि) की संवैधानिक/कानूनी पात्रता और उसके सरकारी जाति प्रमाण पत्र का है। यदि किसी व्यक्ति ने गलत/फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर आरक्षित/निर्दिष्ट सीट से चुनाव लड़ा है, तो यह सीधे तौर पर व्यापक लोकहित (Larger Public Interest) से जुड़ा हुआ मुद्दा है।आवेदक (पत्रकार मृण्मयी पाण्डेय) ने पटवारी/RI की जांच रिपोर्ट, इनवर्ड तिथि और फाइल की मूवमेंट शीट मांगी थी, जो शुद्ध रूप से प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं, न कि किसी की व्यक्तिगत निजता। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकारी अपनी प्रशासनिक नाकामी और फर्जीवाड़े को छिपाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की आधी-अधूरी व्याख्या कर आवेदकों को गुमराह कर रहे हैं।
पुराना ढर्रा: पहले तहसीलदार को बचाने में लगी थीं, CS के आदेश के 4 महीने बाद भी रिपोर्ट गोल!
यह पहला मौका नहीं है जब सूरजपुर SDM शिवानी जायसवाल की कार्यशैली पर उंगलियां उठी हों। इससे पहले भी एक विवादित मामले में एक तहसीलदार सुरेन्द्र पैंकरा को बचाने के लिए गलत और भ्रामक जांच रिपोर्ट तैयार करने के गंभीर आरोप इन पर लग चुके हैं।
उस मामले की गंभीरता को देखते हुए जब राज्य के मुख्य सचिव (Chief Secretary) द्वारा उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए गए, तब भी SDM कार्यालय की टालमटोल नीति जारी रही। आलम यह है कि मुख्य सचिव के स्पष्ट निर्देश के 4 महीने बीत जाने के बाद भी जांच प्रतिवेदन (Inquiry Report) जमा नहीं किया गया है। यह सीधे तौर पर शीर्ष प्रशासनिक आदेशों की अवहेलना और अपने पद के अहंकार को दर्शाता है।
निष्पक्ष जांच की उठी मांग, प्रथम अपील और उच्च स्तरीय समिति का रुख करेंगे आवेदक
प्रशासनिक स्तर पर हो रही इस लीपापोती के खिलाफ अब आरपार की लड़ाई की तैयारी है। एसडीएम कार्यालय के इस मनमाने आदेश के खिलाफ अपर कलेक्टर, सूरजपुर के समक्ष प्रथम अपील दायर की जा चुकी है, जिसमें जनप्रतिनिधि की पात्रता से जुड़े मामले को ‘लोकहित’ साबित करते हुए पूरी फाइल नोटिंग और रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की गई हैं।
फर्जी प्रमाण पत्र जारी करने के इस पूरे फर्जीवाड़े की शिकायत राज्य स्तरीय हाई पावर कास्ट स्क्रूटनी कमेटी से की जाएगी।जनता के अधिकारों और पारदर्शिता के लिए बने RTI कानून को ढाल बनाकर अपने ही गलत फैसलों को छिपाना किसी भी जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी की गरिमा के खिलाफ है। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और शासन के वरिष्ठ अधिकारी इस पूरे घटनाक्रम पर क्या कड़ा संज्ञान लेते हैं या फिर जिम्मेदार अधिकारी इसी तरह जांचों को ठंडे बस्ते में डालते रहेंगे।



