छत्तीसगढ़ के 1.60 लाख LB संवर्ग शिक्षकों को झटका: 2018 के संविलियन से ही गिना जाएगा सेवाकाल, पहली नियुक्ति से पेंशन-ग्रेच्युटी का दावा खारिज…

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हिंद स्वराष्ट्र रायपुर : छत्तीसगढ़ के लगभग 1.60 लाख शिक्षक (एलबी) संवर्ग की वर्षों पुरानी मांग पर राज्य सरकार ने पूर्ण विराम लगाते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। स्कूल शिक्षा विभाग ने स्पष्ट आदेश जारी कर दिया है कि शिक्षकों को पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों की गणना शिक्षाकर्मी के रूप में हुई पहली नियुक्ति की तारीख से नहीं, बल्कि 1 जुलाई 2018 (संविलियन की तिथि) से की जाएगी। सरकार का यह फैसला प्रदेशभर के शिक्षकों के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है।
2018 से पहले की 10–15 साल की सेवा शून्य
सरकार के इस निर्णय का सीधा असर उन शिक्षकों पर पड़ेगा जिन्होंने 10 से 15 वर्षों तक पंचायत और नगरीय निकायों के तहत शिक्षाकर्मी के रूप में सेवाएं दी थीं।
शासकीय दर्जा 2018 से : सरकार का तर्क है कि संविलियन से पूर्व शिक्षक निकाय/पंचायत के कर्मचारी थे, न कि राज्य शासन के नियमित कर्मचारी। अतः उस अवधि को शासकीय सेवा में नहीं जोड़ा जा सकता।
समान मानी जाएगी सेवा: यदि किसी शिक्षक की नियुक्ति 2005 में हुई हो और किसी की 2012 में, लेकिन दोनों का संविलियन 1 जुलाई 2018 को हुआ है, तो दोनों की शासकीय सेवा अवधि की गणना एक ही तारीख से होगी।
उदाहरण से समझें नुकसान
यदि कोई शिक्षक 2008 में शिक्षाकर्मी बना और 1 जुलाई 2018 को उसका संविलियन हुआ। वह वर्ष 2038 में सेवानिवृत्त होता है, तो उसकी कुल सेवा 30 वर्ष न मानकर केवल 20 वर्ष (2018 से 2038) ही मानी जाएगी। शुरुआती 10 वर्षों का कार्यकाल पेंशन व वित्तीय लाभों से पूरी तरह बाहर रहेगा।
हाई कोर्ट के निर्देश के बाद सरकार का अंतिम निर्णय
शिक्षकों ने पहली नियुक्ति से सेवा अवधि जोड़ने की मांग को लेकर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। 23 जनवरी 2026 को हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को संवैधानिक व मानवीय पहलुओं के आधार पर विचार करने का निर्देश दिया था। सरकार ने मामले का विस्तृत परीक्षण करने के बाद याचिकाकर्ताओं की मांग को खारिज करते हुए अपना अंतिम आदेश जारी किया।
शिक्षक संगठनों में भारी आक्रोश
सरकार के इस फैसले से प्रदेशभर के शिक्षक संगठनों में तीव्र असंतोष व्याप्त है। संघ के प्रतिनिधियों का कहना है कि वर्षों तक सरकारी स्कूलों में सेवाएं देने के बावजूद शुरुआती कार्यकाल को नजरअंदाज करना न्यायसंगत नहीं है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि इस फैसले से शिक्षकों को सेवानिवृत्ति के समय भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा, जिसको लेकर आगे की रणनीति तैयार की जा रही है।

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