हिंद स्वराष्ट्र सूरजपुर : कृषि उपज मण्डी समिति सूरजपुर के अंतर्गत आने वाले विभिन्न शासकीय धान उपार्जन केन्द्रों में चल रहे निर्माण कार्यों में एक बड़ा ही दिलचस्प और संदेहास्पद खेल सामने आया है। मण्डी समिति द्वारा जारी आधिकारिक सूची के अनुसार, जिले के 11 अलग-अलग उपार्जन केन्द्रों में पक्का फड़ निर्माण एवं समतलीकरण का कार्य कराया जा रहा है, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि प्रत्येक कार्य की प्राक्कलित राशि (लागत) बिल्कुल एक समान यानी 9.94 लाख रुपये रखी गई है।
इतना ही नहीं, कुल 11 निर्माण कार्यों के ठेके केवल दो ही चहेते ठेकेदारों में बांट दिए गए हैं। इस पूरे मामले में विभागीय कार्यप्रणाली, प्राक्कलन (Estimate) की सत्यता और निविदा प्रक्रिया (Tendering Process) को लेकर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।
10 लाख से कम की सीमा का खेल?
जानकारों की मानें तो सरकारी विभागों में अक्सर ई-टेंडरिंग की जटिल प्रक्रियाओं, उच्च स्तरीय वित्तीय स्वीकृतियों और कड़े नियमों से बचने के लिए जानबूझकर किसी भी कार्य की लागत को 10 लाख रुपये से कम (जैसे 9.94 लाख) रखा जाता है। सूरजपुर मण्डी समिति के इन सभी 11 कार्यों में लागत का ठीक 9.94 लाख रुपये होना इसी प्रशासनिक लूपहोल (खामी) की ओर इशारा करता है। क्या सभी जगहों पर जमीन का आकार, समतलीकरण की जरूरत और सामग्री की लागत बिल्कुल एक समान थी? यह अपने आप में एक बड़ा यक्ष प्रश्न है।
केवल दो ठेकेदारों पर पूरी मण्डी मेहरबान
सार्वजनिक हुई सूची के मुताबिक, मण्डी समिति के अधिकारियों ने सारे नियम-कायदों को ताक पर रखकर 11 में से 8 महत्वपूर्ण काम अकेले एक ही ठेकेदार को सौंप दिए हैं, जबकि शेष 3 काम दूसरे ठेकेदार के खाते में गए हैं:
1. अंकित दुबे (गणेशपुर, सिलफिली): इन्हें कुल 8 स्थानों पर कार्य मिला है। इनमें बतरा, कंचनपुर, कंदरई, सिरसी, केशवनगर, बकीरमा, टमकी और खोपा शामिल हैं। इन 8 कार्यों की कुल लागत ₹79.52 लाख है।
2. विनय जायसवाल (बड़सरा, भैयाथान): इन्हें शेष 3 स्थानों—कुर्शीडीह, करौटी बी और सावारांवा का कार्य सौंपा गया है। इन 3 कार्यों की कुल लागत ₹29.82 लाख है।
गुणवत्ता और पारदर्शिता पर उठ रहे सवाल
ग्रामीणों और स्थानीय जागरूक नागरिकों का कहना है कि जब एक ही ठेकेदार को इतने सारे क्षेत्रों में एक साथ काम दे दिया जाता है, तो समय पर काम पूरा होना और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होते हैं। इसके साथ ही, स्थानीय छोटे ठेकेदारों को इस प्रक्रिया से दूर रखकर केवल चुनिंदा लोगों को उपकृत करना सीधे तौर पर पारदर्शिता पर सवालिया निशान खड़ा करता है।
अब देखना यह होगा कि इस मामले के उजागर होने के बाद क्या जिला प्रशासन या उच्च अधिकारी इन निर्माण कार्यों के प्राक्कलन और आवंटन प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कराएंगे, या फिर ‘9.94 लाख का यह जादुई आंकड़ा’ फाइलों में सिमट कर रह जाएगा।



