अंबिकापुर: सवालों पर ‘सहानुभूति’ के आंसू या महिला कार्ड? महापौर मंजूषा भगत के रोने पर खड़े हुए गंभीर सवाल

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हिंद स्वराष्ट्र अम्बिकापुर: भ्रष्टाचार के आरोप लगें तो जवाब दीजिए, सबूत पेश करिए और खुद को बेदाग साबित कीजिए। लेकिन अंबिकापुर की सियासत में आजकल एक नया ही ट्रेंड देखने को मिल रहा है—”जब भी घिरो, रोना शुरू कर दो।”
हाल ही में अंबिकापुर की महिला महापौर मंजूषा भगत का एक कथित रिश्वत लेने का ऑडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस ऑडियो के सामने आने के बाद उम्मीद थी कि महापौर साहिबा प्रशासनिक या कानूनी तौर पर अपनी बेगुनाही के सबूत रखेंगी। लेकिन हुआ इसके ठीक उलट। वे कैमरे के सामने आईं, हमेशा की तरह उनकी आंखों से आंसू बहे, और उन्होंने इसे अपने खिलाफ एक बड़ी “साजिश” करार दे दिया।
बात सिर्फ रोने तक सीमित रहती तो शायद लोग इसे भावुकता मान लेते, लेकिन इस बार भी उन्होंने अपने बचाव में ‘महिला होने’ और ‘अनुसूचित जाति’ से ताल्लुक रखने का कार्ड खेल दिया।


सवाल पर आंसू: क्या महिला होना कोई कमज़ोरी है?
यह कोई पहली बार नहीं है जब महापौर मंजूषा भगत मीडिया के सामने इस तरह फफक-फफक कर रोई हैं। शहर का हर नागरिक और मीडियाकर्मी गवाह है कि जब भी नगर निगम के कामकाज, विकास कार्यों में लापरवाही या किसी विवाद पर उनसे तीखे सवाल पूछे जाते हैं, तो जवाब देने के बजाय उनकी आंखों से गंगा-जमुना बहने लगती हैं।
महापौर की इन बातों और आंसुओं के पीछे का नैरेटिव कुछ ऐसा होता है मानो—“मैं महिला हूँ, इसलिए मुझे निशाना बनाया जा रहा है।”
अब यहाँ सबसे बड़ा और तीखा सवाल यह उठता है: क्या प्रशासनिक पदों पर बैठी महिलाओं के खिलाफ सवाल पूछना अपराध है? और क्या हर जांच या सवाल के सामने खुद को ‘पीड़ित’ बताकर रो देना, बाकी उन करोड़ों महिलाओं का अपमान नहीं है जो हर दिन संघर्ष करके समाज में अपनी ताकत का लोहा मनवा रही हैं?
जब बातें ऐसी हों मानो ‘महिला होना ही पाप है
महापौर जिस तरह से हर बार रोते हुए महिला होने का रोना रोती हैं, उससे समाज में एक बेहद गलत और नकारात्मक संदेश जाता है। उनकी बातें सुनकर ऐसा प्रतीत होने लगता है मानो इस देश में महिला होना या राजनीति में आना ही कोई पाप या अभिशाप हो।
तल्ख हकीकत:
आज भारत की महिलाएं राष्ट्रपति से लेकर फाइटर जेट उड़ाने और बड़े-बड़े कॉर्पोरेट साम्राज्य संभालने तक का काम कर रही हैं। जब उन पर सवाल उठते हैं, तो वे अपनी कार्यप्रणाली और तथ्यों से जवाब देती हैं, न कि आंसुओं से। ऐसे में एक जिम्मेदार संवैधानिक पद (महापौर) पर बैठीं मंजूषा भगत का बार-बार ‘वीमेन कार्ड’ खेलना महिला सशक्तिकरण की पूरी परिभाषा को ही कमज़ोर करता है।

जनता को आंसुओं से सरोकार नहीं, सच की तलाश है
अंबिकापुर की जनता ने उन्हें रोने के लिए नहीं, बल्कि शहर की कमान संभालने और विकास करने के लिए चुनकर भेजा है। ऑडियो असली है या नकली, यह जांच का विषय है। लेकिन जांच से पहले ही ‘महिला होने’ और ‘जाति’ की ढाल के पीछे छिप जाना राजनीति का सबसे सस्ता पैंतरा नजर आता है।
अगर ऑडियो फर्जी है, तो महापौर को डंके की चोट पर कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए और जांच का सामना करना चाहिए। रोकर सहानुभूति बटोरने की यह कोशिश कहीं न कहीं इस बात का इशारा करती है कि शायद उनके पास तीखे सवालों के सीधे और ठोस जवाब नहीं हैं।

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