हिंद स्वराष्ट्र वाड्रफनगर (बलरामपुर): एक तरफ सरकार जंगलों को बचाने के लिए करोड़ों के फंड जारी कर रही है, वहीं दूसरी ओर बलरामपुर वन मंडल के वाड्रफनगर वन परिक्षेत्र से लापरवाही की ऐसी तस्वीर सामने आ रही है जो रूह कंपा देने वाली है। वाड्रफनगर के घाट पेंडारी और वन परिक्षेत्र के जंगलों में पिछले कई दिनों से भीषण आग लगी हुई है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी चैन की बंसी बजा रहे हैं।
धुएं के आगोश में जंगल
घाट पेंडारी के पहाड़ों और मैदानी जंगलों में आग ने तांडव मचा रखा है। सैकड़ों एकड़ में फैली बेशकीमती वन संपदा और वन्यजीव इस आग की भेंट चढ़ रहे हैं। धुएं के गुबार दूर-दूर से देखे जा सकते हैं, लेकिन विडंबना देखिए कि जिस विभाग पर इन जंगलों की सुरक्षा का जिम्मा है, वह पूरी तरह नतमस्तक नजर आ रहा है।
परिक्षेत्र अधिकारी की ‘कुंभकरणी नींद’
क्षेत्र में चर्चा है कि वन परिक्षेत्र अधिकारी राम नारायण राम को शायद जंगलों के जलने से कोई सरोकार नहीं है। ग्रामीणों का आरोप है कि आगजनी की सूचना के बावजूद धरातल पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं दिख रही है।
“ऐसा लगता है मानो अधिकारी कुंभकरणी नींद में सोए हुए हैं। जब रक्षक ही मौन हो जाए, तो भक्षक बने आग से जंगलों को कौन बचाएगा?”
सिस्टम फेल: दावों की खुली पोल
आग बुझाने के लिए विभाग के पास न तो पर्याप्त संसाधन नजर आ रहे हैं और न ही कोई पुख्ता रणनीति। हर साल फायर वॉचर और गश्त के नाम पर लाखों खर्च किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आग लगने पर वन विभाग के पास ‘हाथ पर हाथ धरे बैठने’ के अलावा कोई चारा नहीं बचता।
मुख्य बिंदु जो प्रशासन पर दाग लगा रहे हैं:
निगरानी का अभाव: घाट पेंडारी और आस पास के क्षेत्र में गश्त की भारी कमी।
वन्यजीवों पर संकट: आग के कारण जंगली जानवर रिहायशी इलाकों की ओर भागने को मजबूर हैं।
अधिकारी की उदासीनता: राम नारायण राम की कार्यप्रणाली पर स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश।
अगर वक्त रहते इस आग पर काबू नहीं पाया गया और जिम्मेदार अधिकारियों पर नकेल नहीं कसी गई, तो वाड्रफनगर के ये हरे-भरे जंगल सिर्फ यादों और कागजों में सिमट कर रह जाएंगे। क्या उच्च अधिकारी इस ‘कुंभकरणी नींद’ को तोड़कर कोई सख्त कदम उठाएंगे या फिर आग की लपटों को अपना काम करने की खुली छूट दी जाएगी?

