हिंद स्वराष्ट्र अंबिकापुर : सरगुजा जिले के नवापारा शहरी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में हुए करोड़ों के दवा घोटाले में एक नया मोड़ आ गया है। जांच समिति द्वारा भ्रष्टाचार के पुख्ता सबूत पेश किए जाने के महीनों बाद भी अब तक दोषियों पर कोई कार्रवाई नहीं होना, जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
दस्तावेज ‘खाक’, जांच ‘साफ’, फिर भी कार्रवाई ‘हाफ’
हैरानी की बात यह है कि जांच दल ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि वर्ष 2019 से 2024 के बीच के महत्वपूर्ण रिकॉर्ड ‘आग’ के हवाले कर दिए गए। इसके बावजूद, वर्तमान में उपलब्ध 2024-25 के दस्तावेजों में ही करोड़ों की धांधली पकड़ी गई है। लेकिन विडंबना देखिए कि जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होने और भ्रष्टाचार सिद्ध होने के बाद भी आज तक न तो किसी पर FIR हुई है और न ही किसी को निलंबित किया गया है।
रसूख के आगे नतमस्तक सिस्टम?
स्थानीय गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि इस पूरे मामले के मुख्य आरोपी डॉ. आयुष जायसवाल को उनके रसूख का लाभ मिल रहा है। डॉ. आयुष वर्तमान में सूरजपुर में पदस्थ SDM शिवानी जायसवाल के पति हैं। क्या यही कारण है कि सरकारी खजाने में करोड़ों की सेंध लगाने वालों के खिलाफ फाइलें आगे नहीं बढ़ रही हैं?



जांच रिपोर्ट के वो अहम खुलासे जिन पर नहीं हुआ एक्शन:मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) को सौंपी गई जांच समिति की रिपोर्ट ने भ्रष्टाचार की परतें खोल दी हैं। रिपोर्ट के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) को सौंपी गई जांच समिति की रिपोर्ट ने भ्रष्टाचार की परतें खोल दी हैं। रिपोर्ट के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
दस्तावेज जलाने की साजिश: जब जांच समिति ने साल 2019 से 2024 के बीच की खरीदी के रिकॉर्ड मांगे, तो केंद्र द्वारा यह कहकर पल्ला झाड़ लिया गया कि ‘कार्यालय में आग लगने के कारण पुराने दस्तावेज जल गए हैं’। इसे सबूतों को मिटाने की एक बड़ी साजिश के रूप में देखा जा रहा है।
नियमों की धज्जियां (सिंगल टेंडर घोटाला): नियमों के मुताबिक दवा खरीदी के लिए प्रतिस्पर्धात्मक कोटेशन मंगाने थे, लेकिन जांच में पाया गया कि साठगांठ कर केवल एक ही फर्म (सिंगल टेंडर) को 50-50 हजार रुपये के कई ऑर्डर एक ही दिन में थमा दिए गए।
बिना रेट के ‘अंधी’ खरीदी: वित्तीय वर्ष 2024-25 की फाइलों में दवाओं और उपकरणों की दर (Rate) का उल्लेख ही नहीं है। बिना दाम तय किए ही लाखों रुपये के ऑर्डर जारी कर दिए गए।
कीमोथेरेपी दवाओं में फर्जीवाड़ा: डॉ. आयुष जायसवाल और अन्य संबंधितों पर आरोप है कि उन्होंने कीमोथेरेपी की दवाओं के लिए CGMSCL से अनिवार्य NOC तक नहीं ली। खुद ही डिमांड लेटर लिखा और खुद ही अपने नाम पर दवाएं इश्यू करवाकर खर्च दिखा दिया।
गायब स्टॉक: रजिस्टर में दवाओं की एंट्री और वार्डों में दवाओं की असल सप्लाई के बीच कोई मेल नहीं मिल रहा है।
रसूख के रक्षण में दबा भ्रष्टाचार?
जांच रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से डॉ. आयुष जायसवाल (तत्कालीन प्रभारी चिकित्सा अधिकारी) और डॉ. हिमांशु गुप्ता के कार्यकाल के दौरान हुई धांधली का जिक्र है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज है कि SDM पति होने के नाते डॉ. आयुष को बचाने की कोशिशें की जा सकती हैं।
अधिकारियों पर लटकी तलवार
जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कर दिया है कि लिपिकीय वर्ग से स्टोरकीपर का काम लेना और नियमों के विरुद्ध जाकर चहेती फर्मों को उपकृत करना सीधे तौर पर गबन की श्रेणी में आता है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन अपने ही ‘पावरफुल’ अधिकारी के परिवार पर कार्रवाई करता है या मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।
आरटीआई कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों का कहना है कि अगर आरोपी कोई आम कर्मचारी होता, तो अब तक जेल की सलाखों के पीछे होता। लेकिन यहाँ ‘साहब’ के पति पर मेहरबानी समझ से परे है। क्या CMHO और जिला प्रशासन राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव में इस बड़े घोटाले को दबाने की कोशिश कर रहे हैं?



