हिंद स्वराष्ट्र सूरजपुर : जिला सूरजपुर में भू-राजस्व नियमों की धज्जियां उड़ाने का एक ऐसा मामला सामने आया है, जहाँ रक्षक ही भक्षक की भूमिका में नजर आ रहे हैं। लटोरी तहसील में शासकीय पट्टे की जमीनों को बिना कलेक्टर की अनुमति के खुर्द-बुर्द करने के मामले में अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) शिवानी जायसवाल की भूमिका संदिग्ध घेरे में है। ताजा दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि एसडीएम महोदया ने गंभीर वित्तीय और कानूनी अनियमितताओं के बावजूद आरोपी तहसीलदार को क्लीन चिट देने की पूरी स्क्रिप्ट तैयार कर ली है।
‘कारनामा’ उजागर हुआ तो बचाव में उतरा प्रशासन
बता दें कि समाचार पत्र हिंद स्वराष्ट्र और सिंधु स्वाभिमान में “लटोरी तहसीलदार कारनामा” शीर्षक से प्रकाशित खबरों के बाद प्रशासन में हड़कंप मच गया था। मामले की जांच में यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि ग्राम लटोरी के खसरा नंबर 213/2, 421/2 और 114/1 की भूमि, जो कि मूल रूप से शासकीय पट्टे की जमीन थी, उसे बिना कलेक्टर की अनिवार्य अनुमति के बेचा गया। यह सीधे तौर पर भू-राजस्व संहिता की धारा 165 7 (ख) का खुला उल्लंघन है।
SDM की अजीबोगरीब दलील: “गलती तो हुई, पर नीयत साफ थी”
सबसे चौंकाने वाला पहलू एसडीएम सूरजपुर द्वारा कलेक्टर को भेजी गई रिपोर्ट है। एक तरफ एसडीएम स्वीकार करती हैं कि तहसीलदार ने पट्टे की जमीन पर चौहद्दी (Boundary) जारी की और बिना अनुमति रजिस्ट्री होने दी, लेकिन दूसरी तरफ वे इसे “सद्भाविक त्रुटि” (Good faith error) बताकर ढाल बन रही हैं।
तर्क 1: एसडीएम का कहना है कि तहसीलदार ने जानकारी होने के बाद नामांतरण (Mutation) नहीं किया, इसलिए यह केवल एक छोटी सी गलती है।
तर्क 2: खसरा नंबर 213/2 के मामले में एसडीएम ने सारा ठीकरा राजस्व निरीक्षक (RI) पर फोड़ दिया कि उसने रिपोर्ट में पट्टे की जमीन का जिक्र नहीं किया था, इसलिए तहसीलदार ने नामांतरण कर दिया।
सवाल यह उठता है कि क्या एक जिम्मेदार पद पर बैठा अधिकारी इतना अनजान हो सकता है कि उसे पट्टे की जमीन और सामान्य जमीन का फर्क समझ न आए? या फिर यह ‘सद्भावना’ किसी बड़े लेनदेन का हिस्सा है?
पत्रकार पर ही मढ़ दिया दोष
जब तहसीलदार से इस भ्रष्टाचार पर जवाब मांगा गया, तो उन्होंने अपनी गलती मानने के बजाय शिकायतकर्ता पत्रकार पर ही निशाना साधा। तहसीलदार ने अपने लिखित जवाब में आरोप लगाया कि “पत्रकार का उद्देश्य कुछ और है और उद्देश्य पूरा नहीं होने पर मुझे बदनाम किया जा रहा है।” अब इस मामले में तहसीलदार ही बता पाएंगे कि पत्रकार का उद्देश्य क्या था??हैरानी की बात यह है कि एसडीएम ने तहसीलदार के इस बचकाने और गैर-जिम्मेदाराना तर्क को भी अपनी जांच का आधार बनाया है, जो उनके पक्षपाती रवैये को दर्शाता है।
मुख्य सवाल जो एसडीएम की कार्यप्रणाली पर पर्दा उठाते हैं:
1. जब नियम स्पष्ट है कि पट्टे की जमीन बिना कलेक्टर की अनुमति के नहीं बिक सकती, तो तहसीलदार ने चौहद्दी क्यों जारी की?
2. क्या धारा 165 का उल्लंघन करने पर केवल ‘नोटिस-नोटिस’ का खेल खेलना ही एसडीएम की जिम्मेदारी है?
3. पट्टे की जमीन की रजिस्ट्री हो जाना ही अपने आप में एक अपराध है, फिर तहसीलदार को “जानबूझकर त्रुटि नहीं करना” कहकर बचाने की कोशिश क्यों की जा रही है?
क्या प्रशासन की नजर में “भूलवश” किया गया अपराध, अपराध नहीं होता? सूरजपुर जिले के लटोरी तहसील में हुए ताजा जमीन घोटाले और उस पर एसडीएम शिवानी जायसवाल द्वारा दी गई जांच रिपोर्ट इसी ओर इशारा कर रही है। पट्टे की शासकीय जमीनों की अवैध खरीद-बिक्री के मामले में एसडीएम ने जिस तरह तहसीलदार को बचाने के लिए ‘शब्दों की बाजीगरी’ की है, उससे साफ है कि यह मामला केवल एक ‘त्रुटि’ नहीं, बल्कि गहरी मिलीभगत है।
कानून की धज्जियां: धारा 165 (7-ख) का खुला उल्लंघन
दस्तावेजों के अनुसार, ग्राम लटोरी के खसरा नंबर 213/2, 421/2 और 114/1 की भूमि मूलतः शासकीय पट्टे की है। छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 165 (7-ख) स्पष्ट रूप से कहती है कि शासन द्वारा आवंटित पट्टे की भूमि को बिना जिला कलेक्टर की पूर्व अनुमति के हस्तांतरित (बेचा) नहीं जा सकता।
बावजूद इसके:
तहसीलदार लटोरी ने इन पट्टे की जमीनों पर बिक्री हेतु चौहद्दी (Boundary) जारी कर दी।
खसरा नंबर 213/2 का तो बाकायदा नामांतरण (Mutation) भी कर दिया गया।
एसडीएम ने स्वयं स्वीकार किया है कि यह धारा 165 (7-ख) का सीधा उल्लंघन है।
SDM की रिपोर्ट: न्याय का गला घोंटने की कोशिश?
हैरानी की बात यह है कि जब कार्रवाई की बारी आई, तो एसडीएम शिवानी जायसवाल ने कलेक्टर को भेजी अपनी रिपोर्ट में तहसीलदार को यह कहते हुए बचा लिया कि:
“तहसीलदार द्वारा जानबूझकर त्रुटि कारित करना प्रतीत नहीं होता है… यह त्रुटि सद्भाविक प्रतीत होती है।”
सवाल यह है:
* सद्भावना या मिलीभगत?: एक राजस्व अधिकारी (तहसीलदार), जिसके पास जमीन के सारे रिकॉर्ड (मिसल बंदोबस्त, अधिकार अभिलेख) होते हैं, वह कैसे “अनजाने” में पट्टे की जमीन की चौहद्दी जारी कर सकता है?
* नामांतरण का खेल: खसरा नंबर 213/2 के मामले में तहसीलदार ने पट्टे की जमीन का नामांतरण आदेश 23.04.2024 को पारित कर दिया। क्या एक तहसीलदार को इतना भी ज्ञान नहीं कि पट्टे की जमीन पर कलेक्टर की अनुमति अनिवार्य है?
क्या है असली सच?
एसडीएम ने अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि तहसीलदार ने “त्रुटि” की है, लेकिन उस पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश करने के बजाय मामले को केवल सिविल कोर्ट या कलेक्टर न्यायालय की ओर भेजने की खानापूर्ति की है। यह सीधे तौर पर आरोपी अधिकारी को ‘सेफ पैसेज’ देने की कोशिश है ताकि भविष्य में यह कहकर बचा जा सके कि “जांच में कुछ गलत इरादा नहीं पाया गया”।
जनता का सवाल: क्या आम आदमी भी “सद्भावना” के नाम पर पट्टे की जमीन बेच सकता है? अगर नहीं, तो लटोरी तहसीलदार पर मेहरबानी क्यों?
यह पूरा घटनाक्रम इशारा करता है कि सूरजपुर प्रशासन के भीतर एक बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा है जो सरकारी जमीनों को निजी हाथों में सौंपने के लिए कागजी हेराफेरी को ‘सद्भावना’ का नाम दे रहा है। अब देखना यह होगा कि कलेक्टर सूरजपुर इस ‘मैनेज्ड’ जांच रिपोर्ट पर क्या एक्शन लेते हैं या फिर भ्रष्टाचार की यह फाइल भी धूल फांकने के लिए छोड़ दी जाएगी।



