आखिर राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र को क्यों नहीं मिला शासन की योजनाओं का लाभ…हमर उत्थान सेवा समिति का सवाल : आखिर जवाबदेही किसकी है ?

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हिंद स्वराष्ट्र सूरजपुर भूषण बघेल : केंद्र से लेकर राज्य तक की सरकारें मंचों से यह दावा करती नहीं थकतीं कि जनजातीय अंचलों में अब कोई भी व्यक्ति शासन की योजनाओं से वंचित नहीं रहेगा। फाइलों में योजनाएं हैं, भाषणों में संकल्प हैं और पोस्टरों में विकास की चमक है। लेकिन जब इन दावों को ज़मीन पर उतारकर देखा जाता है, तो तस्वीर बिल्कुल उलट नज़र आती है। ट्राइबल क्षेत्र में आज भी ऐसे लोग हैं, जिनके लिए “योजना” सिर्फ एक सुना हुआ शब्द है, मिला हुआ अधिकार नहीं।


चेहरे पर समय से पहले पड़ चुकी झुर्रियां

सूरजपुर जिले के प्रेमनगर विकासखंड के ग्राम पंचायत केदारपुर, पिवरी महुआ चौक के पास रहने वाला बृज पण्डो उसी हकीकत का चेहरा है, जिसे सरकारी आंकड़े शायद कभी नहीं देखते। उम्र करीब पचास साल। चेहरे पर समय से पहले पड़ चुकी झुर्रियां, शरीर पर फटे-पुराने, मैले कपड़े और आंखों में लगातार संघर्ष की थकान। बृज पण्डो अपनी पत्नी, बेटे, बहू और छोटे-छोटे बच्चों के साथ यहीं रहता है।

कभी किसी के घर मजदूरी मिल जाए तो ठीक, नहीं तो घर के आंगन में बैठकर बांस से सूपा, मोरा और झलगी बनाता है। दिनभर की मेहनत के बाद भी 150 से 200 रुपये की कमाई हो पाती है, जिससे दो वक्त का राशन, दवा और कभी-कभी नमक-मिर्च की व्यवस्था होती है।

आधार से वंचित, योजनाओं से बाहर

बृज पण्डो बताते हैं कि जब उनके इलाके में आधार कार्ड बनाने की प्रक्रिया चल रही थी, तब वे जंगल में वनोपज लेने गए थे। लौटने पर कहा गया कि समय खत्म हो गया। बस, यहीं से उनकी ज़िंदगी की गाड़ी पटरी से उतरती चली गई। आज तक उनका आधार कार्ड नहीं बना।

आधार नहीं, तो आयुष्मान कार्ड नहीं। आयुष्मान नहीं, तो इलाज का कोई सहारा नहीं। आधार नहीं, तो राशन कार्ड नहीं। राशन कार्ड नहीं, तो सरकारी अनाज नहीं। हालत यह है कि जिस शासन को वह अपना मानता है, उसी शासन की एक भी योजना उसके दरवाज़े तक नहीं पहुंची।


बीमारी ने छीन ली रोज़गार की ताकत

बृज पण्डो बताते हैं कि कभी वह रोज़ जंगल जाता था। लकड़ी, वनोपज और बनी मजदूरी ही उसका सहारा थी। लेकिन करीब दो वर्ष पहले उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। हालत इतनी गंभीर हो गई कि गांव वालों की मदद से उसे अस्पताल ले जाना पड़ा। इलाज तो हुआ, लेकिन उस बीमारी ने बृज की देह से उसकी ताकत छीन ली।

अस्पताल से लौटने के बाद बृज पण्डो पहले जैसा कभी नहीं हो पाया। शरीर कमजोर हो गया, हाथ-पैर कांपने लगे। अब वह न तो जंगल जाकर लकड़ी ला सकता है और न ही बनी मजदूरी कर सकता है। मजबूरी में वह घर के आंगन में बैठकर बांस से सूपा, मोरा और झलगी बनाता है। यही उसकी दुनिया रह गई है।

बीमारी के वक्त भी शासन की कोई स्वास्थ्य योजना, कोई आयुष्मान कार्ड, कोई सहायता उसके काम नहीं आई। इलाज उधार, भरोसे और लोगों की मदद से हुआ।


वन अधिकार और पहचान, दोनों से वंचित

सबसे पीड़ा देने वाली बात यह है कि बृज पण्डो की काबिज वन भूमि का आज तक पट्टा नहीं बना। आसपास के साथी, पड़ोसी, सबको वन अधिकार पत्र मिल चुका है, लेकिन बृज आज भी उसी जंगल और उसी ज़मीन पर “अवैध” माना जाता है, जहां उसका पूरा जीवन बीत गया।

बृज पण्डो की पीड़ा यहीं खत्म नहीं होती। उनका, उनके बेटे-बहू और नाती-पोतों तक का आधार कार्ड नहीं बना। इसी वजह से परिवार का राशन कार्ड भी नहीं है। बहू का टीकाकरण नहीं हुआ, नाती को आज तक कोई टीका नहीं लगा। प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था इस परिवार के लिए सिर्फ दूरी पर खड़ी एक इमारत बनकर रह गई है।


निरीक्षण हुए, हालात नहीं बदले

हैरानी की बात यह है कि इस परिवार की बदहाली किसी से छुपी नहीं रही। प्रेमनगर क्षेत्र में कई बार जनपद सीईओ, तहसीलदार, एसडीएम और अन्य अधिकारी निरीक्षण पर पहुंचे। हर बार उम्मीद जगी कि अब शायद कुछ बदलेगा। लेकिन अफसरों के लौटते ही हालात वहीं के वहीं रहे। कागज़ों में निरीक्षण पूरा हो गया, तस्वीरें खिंच गईं, रिपोर्ट ऊपर चली गई, पर ज़मीन पर कुछ नहीं बदला।

विडंबना यह है कि पण्डो जनजाति को “राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र” कहा जाता है। यह शब्द भाषणों में भारी लगता है, लेकिन बृज पण्डो की झोपड़ी में इसका कोई अर्थ नहीं दिखता।


हमर उत्थान सेवा समिति का हस्तक्षेप और सवाल

इस मामले में हमर उत्थान सेवा समिति ने कहा कि मानवीय आधार पर समिति ने पीड़ित परिवार की पत्नी के नाम से राशन कार्ड बनवाया। साथ ही योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए सहायक आयुक्त और एसडीएम को कई बार इस मामले से अवगत कराया गया, लेकिन किसी स्तर पर कोई ठोस पहल नहीं हुई। लगातार अनदेखी के कारण पीड़ित परिवार को भटकना पड़ा।

समिति ने शासन से मांग की है कि इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए और पीड़ित परिवार को तत्काल सभी शासकीय लाभ दिलाए जाएं।


अधूरे दावों के बीच खड़ा आखिरी सवाल

यह मामला सिर्फ एक बृज पण्डो का नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था पर सीधा सवाल है, जो योजनाओं की सूची तो लंबी बनाती है, लेकिन अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने से पहले ही थक जाती है। जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक विकास के सारे दावे अधूरे रहेंगे। और बृज पण्डो जैसे लोग बांस की कारीगरी करते हुए, हर दिन अपनी खामोशी में एक बड़ा सवाल छोड़ते रहेंगे क्या इस देश की योजनाएं सचमुच उनके लिए हैं।

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