हिंद स्वराष्ट्र सूरजपुर: कहते हैं कि पुलिस की नजरों से अपराधी का बचना नामुमकिन होता है, लेकिन जब खुद खाकी वर्दी पहनने वाले किसी अपने के साथ अन्याय हो, और विभाग ही हाथ पर हाथ धरे बैठा रहे, तो इसे आप क्या कहेंगे? संवेदनहीनता की पराकाष्ठा या फिर जांच के नाम पर सिर्फ औपचारिकता?
आज से ठीक तीन महीने पहले 2 फरवरी की शाम करीब 8 बजे कर्तव्य की वेदी पर अपनी सेवाएं देकर घर लौट रहे एक पुलिस आरक्षक अभय कुमार पाण्डेय की सड़क दुर्घटना में असामयिक और दर्दनाक मौत हो गई थी। वह आरक्षक, जिसने अपनी पूरी जिंदगी दूसरों की सुरक्षा में लगा दी, आज उसका अपना परिवार न्याय की भीख मांग रहा है। लेकिन अफसोस! घटना के 126 दिन बीत जाने के बाद भी ‘हाईटेक’ होने का दावा करने वाली हमारी सूरजपुर पुलिस उस घटनाकारी वाहन और उसके चालक का सुराग तक नहीं लगा पाई है।
अपनों की बेरुखी से टूट रहा पीड़ित परिवार
इस दिशाहीन और कछुआ गति से चल रही जांच ने मृतक आरक्षक के परिजनों को गहरे सदमे और निराशा में धकेल दिया है। परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है। रोते हुए परिजनों का एक ही सवाल है—
“अगर एक पुलिसवाले के हत्यारे को पुलिस नहीं पकड़ सकती, तो आम जनता की सुरक्षा का दावा कैसे किया जा सकता है? क्या हमारे बेटे की जान की कोई कीमत नहीं थी?”
जांच अधिकारी सुशील तिवारी की कार्य प्रणाली से भी परिजनों में काफी आक्रोश हैं, उनका कहना है कि जब प्रत्यक्षदर्शी और इस घटना के मुख्य गवाह द्वारा इस मामले की जानकारी थाना प्रभारी को घटना के बाद तत्काल फोन के माध्यम से दी गई थी फिर इतने दिनों बाद भी उसका बयान क्यों नहीं लिया गया? जब केस हिट एंड रन का है तो पर्याप्त धाराएं क्यों नहीं जोड़ी गई..?
फाइलों में दफन हो गई संवेदना?
मृतक के पिता की मानें तो जांच के नाम पर अब तक केवल कागजी घोड़े दौड़ाए गए हैं। सीसीटीवी फुटेज खंगालने और प्रत्यक्षदर्शियों से पूछताछ करने के बजाय, मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। विभाग के आला अधिकारियों की यह चुप्पी हैरान करने वाली है। जिस विभाग को अपने साथी की मौत पर सबसे ज्यादा आक्रामक होना चाहिए था, वही विभाग आज इतनी ‘बेशर्मी’ और सुस्ती से काम कर रहा है कि आरोपियों के हौसले बुलंद हैं।
उठ रहे हैं गंभीर सवाल:
तकनीक का क्या हुआ? शहर भर में लगे नाइट विजन और स्मार्ट सिटी के सीसीटीवी कैमरे क्या सिर्फ आम जनता का चालान काटने के लिए हैं? एक आरक्षक को कुचलने वाली गाड़ी गायब कैसे हो गई?
इच्छाशक्ति की कमी क्यों? अगर यही घटना किसी रसूखदार या नेता के साथ हुई होती, तो क्या पुलिस अब तक हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती?
सहकर्मियों की एकजुटता कहां है? अपने ही एक साथी के परिवार के आंसू क्या अधिकारियों को नजर नहीं आ रहे?
जल्द गिरफ्तारी की मांग, उग्र आंदोलन की चेतावनी
मृतक आरक्षक के परिजनों और आक्रोशित नागरिकों ने अब साफ कर दिया है कि उन्हें और आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई चाहिए। परिजनों ने आरोपियों की जल्द से जल्द गिरफ्तारी और मामले की किसी सक्षम अधिकारी से निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
यदि पुलिस विभाग अब भी कुंभकर्णी नींद से नहीं जागा और जल्द ही आरोपियों को सलाखों के पीछे नहीं भेजा गया, तो यह मामला केवल एक दुर्घटना की जांच तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह खाकी के रक्षकों के खिलाफ एक बड़ा जन-आंदोलन रूप ले सकता है।
अब देखना यह है कि इस खबर के बाद भी अधिकारियों की आंखों का पानी मर चुका है, या उनके भीतर अपने साथी के प्रति थोड़ी भी संवेदना बाकी है!



