हिंद स्वराष्ट्र सूरजपुर: लटोरी जमीन घोटाले में ‘हिंद स्वराष्ट्र’ की खबर के बाद प्रशासन में मचे हड़कंप के बीच एक नया मोड़ आया है। एसडीएम शिवानी जायसवाल ने एक आधिकारिक ज्ञापन (दिनांक 12.03.2026) जारी कर उस खबर का खंडन किया है जिनमें एक खरीददार को उनका ‘चाचा’ बताया गया था। एसडीएम ने स्पष्ट किया है कि जांच या ग्राम लटोरी से संबंधित किसी भी शिकायत से जुड़ा कोई भी व्यक्ति उनका रिश्तेदार नहीं है।
हालांकि, इस खंडन के बाद भी घोटाले की परतें कम होने के बजाय और उलझती नजर आ रही हैं। जनता और मीडिया अब इस बात पर सवाल उठा रहे हैं कि यदि रिश्तेदारी नहीं है, तो जांच में ‘कंजूसी’ क्यों बरती गई?

एसडीएम मैडम जरा इस मामले में भी प्रकाश डाल देती तो अच्छा होता कि यह शख्स कौन है और शासन से प्राप्त भूमि का नामांतरण बिना कलेक्टर परमिशन के कैसे हो गया?
SDM का पक्ष: “खबर असत्य और भ्रामक”
एसडीएम कार्यालय द्वारा जारी पत्र के अनुसार, समाचार पत्र में प्रकाशित “रिश्तेदारी के आगे झुका कानून” शीर्षक वाली खबर पूर्णतः असत्य, भ्रामक और तथ्यहीन है। एसडीएम का दावा है कि उनके द्वारा की गई पूरी जांच तत्कालीन उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर निष्पक्ष रूप से और नियमानुसार की गई है।
लेकिन… अनुत्तरित सवाल अब भी बरकरार!
एसडीएम के खंडन ने व्यक्तिगत आरोपों पर तो सफाई दे दी, लेकिन जांच की प्रक्रिया पर उठ रहे बड़े सवालों का जवाब अब भी गायब है। सवाल यह हैं कि मैडम द्वारा जांच में गड़बड़ी की गई इन आरोपों पर अपनी प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी और उन समाचारों का खंडन क्यों नहीं किया..? आपको बता दे की इससे पहले भी हमारे द्वारा कई खबरें चलाई गई थी लेकिन मैडम के कान में जू तक नहीं रेंगा, लेकिन जब चाचा–भतीजी वाली बात उजागर हो गई तो उन्होंने तुरंत प्रतिक्रिया दे दी। इतनी ही तत्परता से अगर मैडम बाकी मुद्दों में भी ध्यान दे देती तो शायद हमें इतनी खबरें चलाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती और उनकी इतनी किरकिरी नहीं होती। मैडम शिवानी इन सवालों का भी जवाब दें:
चुनिंदा जांच क्यों?
यदि कोई रिश्तेदारी नहीं थी, तो ‘हिंद स्वराष्ट्र’ द्वारा उठाए गए उन अन्य 3 मामलों को जांच के दायरे में क्यों नहीं लाया गया जिनमें नामांतरण की प्रक्रिया पहले ही पूर्ण हो चुकी थी?
नामांतरण पर चुप्पी:
जिन 3 मामलों (खसरा नं. 213/2, 421/2, 114/1) का जिक्र एसडीएम ने अपनी पहली रिपोर्ट में किया था, उनमें से खसरा नं. 213/2 का नामांतरण नियम विरुद्ध (बिना कलेक्टर अनुमति) होने के बावजूद तहसीलदार को “सद्भाविक त्रुटि” का कवच क्यों दिया गया?
दस्तावेजों का विरोधाभास
एक तरफ एसडीएम मानती हैं कि धारा 165 7(ख) का उल्लंघन हुआ है, दूसरी तरफ इसे जानबूझकर की गई गलती नहीं मानतीं। क्या यह निष्पक्ष जांच का पैमाना है?
रिश्तेदारी की चर्चा बनाम प्रशासनिक पारदर्शिता
भले ही एसडीएम ने पारिवारिक संबंधों से इनकार कर दिया है, लेकिन जमीन घोटाले की गंभीरता इस बात से कम नहीं होती। लटोरी में पट्टे की जमीनों की जिस तरह से बंदरबांट हुई, उसने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिया है। चर्चा अब इस बात की है कि क्या जिला कलेक्टर इस मामले की किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी या किसी दूसरे अनुविभाग के अधिकारी से दोबारा जांच कराएंगे?
निष्कर्ष:
प्रशासनिक खंडन अपनी जगह है, लेकिन लटोरी तहसीलदार के ‘कारनामों’ की फाइल अब भी अधूरी है। जब तक सभी 6 संदिग्ध मामलों की पारदर्शी जांच नहीं होती, तब तक “सद्भावना” और “निष्पक्षता” जैसे शब्द केवल कागजी नजर आएंगे।



