सिंहदेव पट्टे की जमीन के नामांतरण में बड़ा खेल: वसीयत के मात्र 4 दिन बाद मौत और बीमार हालत में अंगूठा लगवाना… क्या प्रशासन की मिलीभगत से अपात्रों को दी गई जमीन? देखिए पूरी खबर…

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हिंद स्वराष्ट्र सूरजपुर/लटोरी : प्रदेश में भू-राजस्व नियमों की धज्जियां उड़ाने का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। शासन द्वारा प्रदत्त ‘सिंहदेव पट्टे’ की जमीन, जिसके हस्तांतरण के लिए कलेक्टर की पूर्व अनुमति अनिवार्य होती है, उसका नामांतरण संदिग्ध परिस्थितियों में एक वसीयत के आधार पर कर दिया गया हैं। मामले में चौंकाने वाली बात यह है कि वसीयतकर्ता की मौत वसीयत लिखे जाने के मात्र 4 दिन बाद ही हो गई।

बीमार हालत में वसीयत और 4 दिन बाद मौत

दो भाइयों के नाम पर दर्ज सिंहदेव पट्टे की जमीन को हड़पने के उद्देश्य से संदिग्ध वसीयत तैयार कराई गई। बताया जा रहा है कि वसीयत के समय वसीयतकर्ता की स्थिति अत्यंत नाजुक थी और वह सही निर्णय लेने की स्थिति में नहीं था। वसीयत निष्पादन के महज 72 घंटों के भीतर वसीयतकर्ता की मृत्यु हो गई, जिससे पूरी प्रक्रिया संदेह के घेरे में है।

इस मामले के मुख्य कानूनी पहलू :
1. सिंहदेव पट्टा या शासन द्वारा प्रदत्त विशेष पट्टों में धारा 165 (7-ख) के तहत हस्तांतरण पर प्रतिबंध होता है
नियम: इस तरह की जमीन को बिना कलेक्टर की पूर्व अनुमति के न तो बेचा जा सकता है और न ही वसीयत या दान के माध्यम से हस्तांतरित किया जा सकता है।
अवैध नामांतरण: यदि नामांतरण बिना अनुमति के हुआ है, तो वह शून्य (Void) माना जाएगा। राजस्व अधिकारी (तहसीलदार) के पास कलेक्टर की अनुमति के बिना ऐसी जमीन का नामांतरण करने का अधिकार नहीं है।
2. वसीयत की वैधता और संदेहास्पद परिस्थितियाँ
वसीयत (Will) के मामले में कानून बहुत सख्त है, खासकर जब वसीयतकर्ता की मृत्यु वसीयत लिखने के तुरंत बाद हो जाए।
* मानसिक और शारीरिक स्थिति: कानून कहता है कि वसीयत के समय व्यक्ति का “Sound Mind” (स्वस्थ चित्त) होना अनिवार्य है।
* संदेह का घेरा: वसीयत के मात्र 4 दिन बाद मृत्यु होना एक “Suspicious Circumstance” है।


नियमों की अनदेखी नायब तहसीलदार की भूमिका पर सवाल

राजस्व नियमों के मुताबिक, सिंहदेव पट्टे (प्रतिबंधित पट्टे) की जमीन का नामांतरण बिना जिला कलेक्टर की लिखित अनुमति के नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद, राजस्व विभाग के अधिकारी नायब तहसीलदार शैलेन्द्र दिवाकर ने बिना किसी उच्चाधिकारी की अनुमति के वसीयत के आधार पर लटोरी तहसील अंतर्गत आने वाले ग्राम पंचायत मोहनपुर की जमीन खसरा नंबर 227 और 228 भूमि स्वामी स्व. रामप्रसाद आत्मज जंगी के जमीन का नामांतरण परिवार से पृथक दो अन्य समाज के व्यक्तियों चरण कुमार और अन्य के नाम पर कर दी गई हैं। आश्चर्य की बात यह रही स्व. रामप्रसाद के जमीन की वसीयत के आधार पर नामांतरण की कार्यवाही की गई इसकी जानकारी मृतक की पत्नी और उसके पुत्र शनि को नहीं दी गई और न ही इस प्रकरण में उनका बयान लिया गया। मृतक की जमीन के नामांतरण की प्रक्रिया में बयान उसकी भतीजी और भाई की बेवा का लिया गया जबकि नियमतः बयान मृतक की पत्नी और उसके पुत्र का लिया जाना चाहिए था। आवेदक द्वारा नामांतरण के लिए दिए गए आवेदन में लिखा गया है कि वसीयत दिनांक 13/09/2024 को किया गया और वसीयतकर्ता की मौत 17/ 09/2024 को हो गई। वसीयतकर्ता की तबीयत खराब थी और वसीयत के चार दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई ऐसे में बीमार व्यक्ति से वसीयत कराया जाना और उसका नामांतरण भी हो जाना विशेषज्ञों की माने तो सीधा-सीधा भ्रष्टाचार और अधिकारी और भू माफियाओं की आपसी सांठगांठ का नतीजा है।

दूसरे पक्ष में हुआ फौती नामांतरण

चरण कुमार द्वारा दूसरे भाई की जमीन पर भी वसीयत के आधार पर दावेदारी पेश की गई थी, लेकिन वहां चालाकी काम नहीं आई। वसीयत के आधार पर नामांतरण होने से पहले ही मृतक के वास्तविक वारिस (पुत्री) के नाम पर ‘फौती नामांतरण’ दर्ज हो गया था।

मुख्य बिंदु जो जांच का विषय हैं:
1. धारा 165 (7-ख) का उल्लंघन: क्या नायब तहसीलदार शैलेन्द्र दिवाकर को बिना कलेक्टर की अनुमति के नामांतरण का अधिकार था?
2. मेडिकल फिटनेस: क्या वसीयत के समय वसीयतकर्ता का मेडिकल सर्टिफिकेट संलग्न था?
3. पटवारी रिपोर्ट: नामांतरण से पहले पटवारी ने जमीन की प्रकृति (सिंहदेव पट्टा) की जानकारी क्यों छिपाई? क्या पटवारी द्वारा वंश वृक्ष में भी वैध वारिसों का नाम छिपाया गया हैं???

4. क्या राजस्व विभाग के अधिकारी और जमीन दलालों ने मिलकर जमीन के अफरा तफरी के लिए घोटालेबाजी का यह नया तरीका खोज लिया हैं??

अब देखने की बात यह होगी कि क्या जिले के उच्च अधिकारी अब इस मामले में स्वतः संज्ञान लेकर इस नामांतरण को निरस्त करने का कार्य करेंगे या अन्य मामलों की तरह इस मामले को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।

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