भू-राजस्व पट्टा धांधली: सरगुजा संभाग कमिश्नर ने खारिज की पुनरीक्षण याचिका; तहसीलदार पिता संजीत पाण्डेय के रसूख से दूसरे की जमीन अपने नाम कराने का मामला उजागर…

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हिंद स्वराष्ट्र अम्बिकापुर। सरगुजा संभाग कमिश्नर न्यायालय द्वारा भू-राजस्व पट्टा मामले में पुनरीक्षण याचिका खारिज किए जाने के बाद अब रसूखदार अधिकारियों द्वारा अपने पद के दुरुपयोग का एक बड़ा मामला सुर्खियों में आ गया है। न्यायालय के आदेश पत्र से यह साफ हो गया है कि पुनरीक्षणकर्ता अचिन्त्य पाण्डेय के पिता संजीत कुमार पाण्डेय स्वयं तहसीलदार के पद पर पदस्थ हैं, और उनके इसी प्रशासनिक प्रभाव का गलत इस्तेमाल कर शासकीय वन भूमि की हेरफेर की गई।

क्या है पूरा मामला?
मामला मैनपाट तहसील के ग्राम आमगांव स्थित खसरा नंबर 63/21 (रकबा 0.506 हेक्टेयर) से जुड़ा हुआ है. अभिलेखों के अनुसार, यह भूमि मूल रूप से वर्ष 1974-75 में रेवती प्रसाद नामक व्यक्ति को शासकीय पट्टे पर पांच वर्ष के लिए आबंटित की गई थी. सितंबर 2023 में कलेक्टर सरगुजा से कथित रूप से विक्रय अनुमति प्राप्त कर पुनरीक्षणकर्ता अचिन्त्य पाण्डेय ने पंजीकृत सेल डीड के माध्यम से इस जमीन को खरीद लिया और राजस्व रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करा लिया।
विवाद तब शुरू हुआ जब शिकायतकर्ता उमा कुमारी ने राजस्व अधिकारियों के समक्ष शिकायत दर्ज कराई कि उक्त भूमि उसकी हैं और नक्शे और चौहद्दी में हेरफेर कर राजस्व अमले की मिलीभगत से उसकी जमीन व वन भूमि पर कब्जा करने का प्रयास किया जा रहा है.

कागजों पर हेरफेर और शर्तों का उल्लंघन

जांच में पाया गया कि जिस विवादित भूमि के विक्रय पत्र में केवल 1 सरई का पेड़ दर्ज था, वहां वास्तव में 55 सरई सहित कुल 84 घने वृक्ष खड़े हैं, जो प्राकृतिक वन भूमि के अंतर्गत आते हैं। इसके अतिरिक्त, जिस शासकीय पट्टे के आधार पर यह पूरी खरीदी की गई, उस पर मूल पट्टाधारी का कभी भौतिक कब्जा या कृषि कार्य रहा ही नहीं, जो कि पट्टे की शर्तों का खुला उल्लंघन है।

​संभाग कमिश्नर नरेंद्र कुमार दुग्गा ने शासन और जनहित को सर्वोपरि मानते हुए कलेक्टर सरगुजा द्वारा शुरू की गई पट्टा वैधता की जांच को पूरी तरह विधिसम्मत ठहराया है। कमिश्नर कोर्ट से याचिका खारिज होने के बाद अब जिम्मेदार अधिकारी के परिजनों पर कलेक्टर न्यायालय की गाज गिरना तय माना जा रहा है। 

जांच में हुआ चौंकाने वाला खुलासा: ‘कागजों पर 1 पेड़, मौके पर खड़ा मिला पूरा जंगल’
कलेक्टर सरगुजा के निर्देश पर अपर कलेक्टर द्वारा की गई मौके की जमीनी जांच में बेहद चौंकाने वाले तथ्य सामने आए:
वन भूमि का स्वरूप: रजिस्ट्री के कागजात में उक्त विवादित भूमि पर महज 1 सरई (साल) का पेड़ होना दर्शाया गया था, जबकि मौके पर भौतिक जांच में 55 सरई के पेड़ों सहित कुल 84 घने और प्राकृतिक रूप से उगे वृक्ष पाए गए. यह पूरी तरह से ‘घने जंगल’ (वन भूमि) की परिभाषा में आता है.
अधिकारियों के पद का दुरुपयोग: उत्तरवादी पक्ष ने लिखित तर्क में आरोप लगाया कि पुनरीक्षणकर्ता के पिता स्वयं तहसीलदार के पद पर पदस्थ हैं. आरोप है कि इसी प्रशासनिक रसूख और प्रभाव का गलत इस्तेमाल कर कूटरचित (फर्जी) राजस्व दस्तावेज तैयार कराए गए और घने वन क्षेत्र की रजिस्ट्री करवा ली गई.
नक्शा तरमीम में अवैध खेल: बिना किसी सक्षम अधिकारी के आदेश अथवा वैध आवेदन के ही राजस्व निरीक्षक (RI) के माध्यम से चुपचाप चालू नक्शे में संशोधन (तरमीम) कर जमीन का चिन्हांकन कहीं और काट दिया गया.
पट्टे की शर्तों का उल्लंघन: मौका जांच से यह भी साफ हुआ कि 1975 में मिले इस शासकीय पट्टे पर मूल पट्टाधारी ने कभी कोई कृषि कार्य या भौतिक कब्जा किया ही नहीं था, जो कि सरकारी पट्टा आबंटन की शर्तों का सीधा और गंभीर उल्लंघन हैं।


प्रशासनिक कार्रवाई से बचने के लिए कानून का सहारा लेने की कोशिश नाकाम
कलेक्टर सरगुजा ने जब अपर कलेक्टर की इस गंभीर जांच रिपोर्ट के आधार पर 8 अगस्त 2025 को पट्टे की वैधता की जांच के लिए पुनरीक्षणकर्ता और मूल पट्टाधारी को नोटिस जारी किया, तो इस प्रशासनिक कार्रवाई से बचने के लिए आवेदक ने कमिश्नर कोर्ट में धारा 50 के तहत पुनरीक्षण याचिका लगा दी थी.
आवेदक का तर्क था कि पट्टा आबंटन के 50 साल बाद उसकी वैधता की जांच नहीं की जा सकती और न ही बिना वरिष्ठ अधिकारियों की अनुमति के पुराने आदेशों का पुनर्विलोकन (Review) किया जा सकता है.
इस पर कमिश्नर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि “शासन हित सर्वोपरि हैं और इस पर समय-सीमा का कोई बंधन नहीं हैं”
सरगुजा संभाग कमिश्नर ने आवेदक के तमाम तर्कों को खारिज करते हुए अपने फैसले में बेहद महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है:
1. स्वतः संज्ञान (Suo Motu) में लिमिटेशन लागू नहीं: कमिश्नर ने स्पष्ट किया कि छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 50 के तहत यदि प्रशासन जनहित या शासकीय भूमि के संरक्षण के लिए स्वतः संज्ञान लेकर पुनरीक्षण या जांच करता है, तो उसमें समय-सीमा (Limitation) का नियम आड़े नहीं आता.
2. कोई अधिकार प्रभावित नहीं हो रहा:  चूंकि कलेक्टर सिर्फ पट्टे की शर्तों और धोखाधड़ी की ‘जांच’ कर रहे हैं और पक्षकारों को सुनवाई का पूरा मौका दे रहे हैं, इसलिए इससे किसी के विधिक अधिकारों का हनन नहीं हो रहा है.
3. प्रशासनिक जांच पूरी तरह वैध: न्यायालय ने कलेक्टर सरगुजा द्वारा जारी 08.08.2025 के जांच आदेश को पूरी तरह विधिसम्मत और प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत माना है.
कमिश्नर कोर्ट द्वारा याचिका खारिज (अग्राह्य) किए जाने के बाद, अब कलेक्टर न्यायालय में इस पूरे पट्टा घोटाले और वन भूमि की कूटरचना को लेकर चल रही जांच की कार्यवाही तेज गति से आगे बढ़ेगी, जिससे क्षेत्र के भू-माफियाओं और भ्रष्ट राजस्व अधिकारियों में हड़कंप मच गया है।

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