हिंद स्वराष्ट्र लटोरी/सूरजपुर : जिला प्रशासन सूरजपुर में इन दिनों नियम और निष्पक्षता ताक पर नजर आ रही है। लटोरी के विवादित तहसीलदार सुरेंद्र साय पैंकरा को बचाने के लिए प्रशासन ने मानों सारी हदें पार कर दी हैं। ताज़ा मामला एसडीएम की उस जांच रिपोर्ट से जुड़ा है, जिसमें तहसीलदार को ‘पाक-साफ’ बताने के लिए पत्रकारिता की मंशा पर ही सवाल खड़े कर दिए गए हैं।
एसडीएम की रिपोर्ट: साद्विक त्रुटि’ या सुनियोजित बचाव?
एसडीएम महोदया द्वारा प्रस्तुत जांच रिपोर्ट ने सबको हैरान कर दिया है। एक ओर तहसीलदार की भारी अनियमितताओं को मात्र एक साद्विक त्रुटि बताकर उन्हें क्लीन चिट दे दी गई, वहीं दूसरी ओर इस मामले को उजागर करने वाले पत्रकार के उद्देश्यों को ही संदिग्ध बता दिया गया।
बड़ा सवाल : आखिर एसडीएम मैडम को पत्रकार के “गुप्त उद्देश्यों” का पता कैसे चला? क्या तहसीलदार ने अपनी सफाई के दौरान कोई ऐसी कहानी गढ़ी जिसे बिना प्रमाण के रिपोर्ट का हिस्सा बना लिया गया? दो अधिकारियों के बीच की ये ‘जुगलबंदी’ अब चर्चा का विषय बनी हुई है।
दोहरा मापदंड: एक पर कार्रवाई, पांच पर मेहरबानी क्यों?
प्रशासन का दोहरा चरित्र इस बात से स्पष्ट होता है कि जिस जमीन की खबर प्रमुखता से प्रकाशित की गई थी, उसमें सुनील शर्मा एवं अन्य के विरुद्ध धारा 165 (7) (ख) के तहत प्रकरण दर्ज कर जमीन को पुनः शासकीय मद में दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
लेकिन, यहां मैडम की ‘दरियादिली’ के कुछ और ही रंग देखने को मिल रहे हैं:
उसी मामले से जुड़े अन्य 5 रसूखदारों पर आज तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
उनके प्रकरण आखिर किन कारणों से लंबित रखे गए हैं?
क्या प्रशासन अपनी सुविधानुसार नियम तय कर रहा है, जहाँ अपनों को ‘दया दान’ और दूसरों पर ‘तानाशाही’ प्रहार किया जा रहा है?
तहसीलदार की भूमिका पर चुप्पी क्यों?
सबसे हास्यास्पद तथ्य यह है कि सुनील शर्मा के खिलाफ हो रही कार्रवाई में स्वयं आरोपी तहसीलदार से ही प्रतिवेदन लिया गया है। तहसीलदार ने स्वीकार किया है कि इस मामले में धारा 165(7)(ख)का उल्लंघन हुआ है।
सवाल उठता है: अगर उल्लंघन हुआ है, तो बिना पटवारी प्रतिवेदन और बिना चौहद्दी मिलान के जमीन के कागजात तैयार करने वाले तहसीलदार पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या नियम सिर्फ जनता के लिए हैं, कुर्सी पर बैठे अधिकारियों के लिए नहीं?
‘सीएम के कथित भांजे’ का रसूख और भविष्य की राह
चर्चा है कि खुद को मुख्यमंत्री का भांजा बताने वाले तहसीलदार सुरेंद्र साय पैंकरा अब तबादले की आड़ में अपने कारनामों पर पर्दा डालने की कोशिश में हैं। उन्हें लगता है कि लटोरी छोड़ते ही बला टल जाएगी।
शायद स्थानीय प्रशासन उन्हें बचा ले, लेकिन राजस्व मंडल और मुख्य सचिव तक पहुंची शिकायतें उनका पीछा नहीं छोड़ेंगी। सत्ता के संरक्षण का दावा करने वाले अधिकारी ये भूल रहे हैं कि कागजों के हेर-फेर का हिसाब कभी न कभी जरूर देना पड़ता है।
अब देखना यह है कि क्या सूरजपुर कलेक्टर इस ‘दोहरी जांच’ और ‘पक्षपातपूर्ण कार्रवाई’ पर संज्ञान लेते हैं या भ्रष्टाचार की इस पटकथा को मौन सहमति दी जाएगी?
जशपुर भागने की तैयारी और प्रशासनिक गलियारों में सुगबुगाहट
जैसे ही इस घोटाले की परतें खुलनी शुरू हुईं, तहसीलदार सुरेन्द्र साय पैंकरा की भूमिका संदिग्ध पाई गई। सूत्रों के हवाले से खबर है कि तहसीलदार पर कार्यवाही की तलवार लटक रही है, जिससे बचने के लिए वे अपने गृह क्षेत्र और स्वघोषित सीएम मामा के पास जशपुर भागने की योजना बना रहे हैं।
विभागीय गलियारों में यह भी चर्चा है कि भागने से पहले कई महत्वपूर्ण फाइलों को खुर्द-बुर्द करने की कोशिश की जा सकती है।
लटोरी भूमि घोटाला केवल एक भ्रष्टाचार का मामला नहीं है, बल्कि यह सिस्टम में बैठे सफेदपोशों द्वारा सरकारी संपत्ति की लूट का उदाहरण है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन सुरेन्द्र साय पैंकरा को जशपुर भागने से पहले पकड़ पाता है या यह मामला फाइलों में दबकर रह जाएगा।
इससे पहले भी तहसीलदार सुरेंद्र पैंकरा के कारनामों की कई खबरें चलाई जा चुकी हैं। इस खबर के अगले अंक में आप देखेंगे कैसे एक शासकीय मद से प्राप्त जमीन जिस पर हिंद स्वराष्ट्र के दखल के बाद बी1 और खसरा में शासन से प्राप्त भूमि अहस्तांतरणीय अंकित किया गया है, उस जमीन की बिक्री के लिए एसडीएम मैडम के चहेते तहसीलदार सुरेंद्र पैंकरा द्वारा कैसे चौहद्दी निर्माण कर दिया गया हैं।



