सरगुजा संभाग में ‘अंधा कानून’ और दम तोड़ता लोकतंत्र…

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प्रशासनिक शिथिलता और भ्रष्टाचार जब लोकशाही की जड़ों को खोखला करने लगें, तो आवाज उठाना चौथे स्तंभ यानी मीडिया का नैतिक धर्म बन जाता हैं।

हिंद स्वराष्ट्र अम्बिकापुर/सरगुजा : लोकतंत्र की परिभाषा है—’जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन’। लेकिन वर्तमान में सरगुजा संभाग की प्रशासनिक कार्यप्रणाली को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ ‘लोकतंत्र’ अब ‘भ्रष्ट तंत्र’ का पर्याय बन चुका है। जनता की गाढ़ी कमाई, जो विकास कार्यों के लिए आवंटित होती है, वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही है और जिम्मेदार अधिकारी आँखों पर पट्टी बांधे धृतराष्ट्र की भूमिका में नजर आ रहे हैं।
जांच की रस्म अदायगी और ‘क्लीन चिट’ का खेल
सरगुजा संभाग में भ्रष्टाचार की शिकायतें कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि शिकायतों पर कार्रवाई का ग्राफ शून्य की ओर है। जब भी कोई बड़ा घोटाला या अनियमितता उजागर होती है, तो आनन-फानन में एक ‘जांच कमेटी’ गठित कर दी जाती है। विडंबना देखिए कि अधिकांश मामलों में जांच की फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं। यदि दबाव बढ़ा और जांच हुई भी, तो पूरी मशीनरी भ्रष्ट अधिकारियों को बचाने के लिए सुरक्षा कवच तैयार करने में जुट जाती है।
दोषी सिद्ध, फिर भी कार्रवाई से कोसों दूर
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति तब उत्पन्न होती है जब जांच रिपोर्ट में अधिकारी स्पष्ट रूप से दोषी पाया जाता है। कायदे से, ऐसे तत्वों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए ताकि समाज में एक कड़ा संदेश जाए। परंतु, सरगुजा में एक अजीब परंपरा चल पड़ी है—दोषी को दंड के बजाय संरक्षण दिया जा रहा है। राजनीतिक सांठगांठ और प्रशासनिक रसूख के मेल ने एक ऐसा ‘सुरक्षा जाल’ बुन लिया है जिसे भेद पाना आम नागरिक के बस की बात नहीं रही।
शासन की मंशा पर सवाल
अधिकारियों की यह मनमानी और बेलगाम रवैया न केवल शासन की छवि को धूमिल कर रहा है, बल्कि सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति की धज्जियां भी उड़ा रहा है। क्या संभाग के उच्च पदस्थ अधिकारियों और शासन को यह नहीं दिख रहा कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं? या फिर यह मान लिया जाए कि मौन ही सहमति है?

शासन और प्रशासन को यह समझना होगा कि जनता का धैर्य असीमित नहीं है। अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायतों पर निष्पक्ष जांच और दोषियों पर त्वरित कार्रवाई नहीं हुई, तो वह दिन दूर नहीं जब आम आदमी का ‘सिस्टम’ पर से विश्वास पूरी तरह उठ जाएगा। सरगुजा संभाग को भ्रष्ट अधिकारियों की चारागाह बनने से बचाना अब केवल प्रशासनिक जरूरत नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अनिवार्यता है।

मुख्य प्रश्न जिनके जवाब अज्ञात :
* प्रशासनिक अनदेखी: अधिकारियों द्वारा शिकायतों को नजरअंदाज क्यों किया जा रहा..?
* संरक्षण की राजनीति: दोषियों को सजा के बजाय ‘सुरक्षा कवच’ क्यों प्रदान किया जा रहा हैं..?
* प्रक्रियात्मक विफलता: जांच कमेटियां केवल दिखावा बनकर क्यों रह गई है..?

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