‘राम-राज्य’ में ‘अफीम’ की खेती और मंत्री जी की ‘नजर’…

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हिंद स्वराष्ट्र संपादकीय : छत्तीसगढ़ में खेती-किसानी को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का दम भरने वाले कृषि विभाग के लिए इन दिनों हवाएं कुछ बदली-बदली और ‘नशीली’ नजर आ रही हैं। विडंबना देखिए कि सूबे के कद्दावर कृषि मंत्री रामविचार नेताम के अपने ही गृह जिले (बलरामपुर-रामानुजगंज) में प्रशासन को उन्नत किस्म के धान या टमाटर नहीं, बल्कि लहलहाती अफीम की फसल मिली है। इसे विडंबना कहें या विभागीय सक्रियता की पराकाष्ठा कि जिस मंत्री के कंधों पर प्रदेश को ‘अन्न का कटोरा’ बनाए रखने की जिम्मेदारी है, उनके ही आंगन में ‘नशे का कटोरा’ तैयार हो रहा था।
चिराग तले अंधेरा या कुछ और?
कहावत है कि चिराग तले हमेशा अंधेरा होता है, लेकिन जब चिराग खुद कृषि मंत्रालय की बागडोर संभाल रहा हो, तो अंधेरा इतना घना कैसे हो गया कि खेतों में प्रतिबंधित अफीम की क्यारियां सज गईं? मंत्री जी अक्सर मंचों से किसानों को आधुनिक खेती और जैविक खाद के फायदे गिनाते हैं, पर शायद वह यह बताना भूल गए कि उनके अपने क्षेत्र में कुछ ‘प्रगतिशील’ किसान ‘नार्को-फार्मिंग’ में डिग्री हासिल कर रहे थे।
साहेब की नजरें और प्रशासनिक ‘मौन’
सवाल यह उठता है कि क्या यह महज एक प्रशासनिक चूक है या फिर सत्ता की धमक के साये में पनपता एक अवैध कारोबार? जब जिले का पूरा अमला मंत्री जी के दौरे और स्वागत की तैयारियों में व्यस्त रहता है, तब खेतों में अफीम का उगना पुलिस और राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े करता है। क्या मंत्री जी को अपने क्षेत्र की मिट्टी की महक और अफीम के फूलों की गंध में फर्क महसूस नहीं हुआ?
“जिस धरती पर अन्नपूर्णा की स्तुति होनी चाहिए थी, वहां नशे की खेती का फलना-फूलना यह बताता है कि सरकार की ‘नजर’ और ‘नियत’ के बीच एक बड़ा अंतर है।”

जवाबदेही किसकी?
मंत्री रामविचार नेताम जी को अब यह स्पष्ट करना होगा कि क्या उनका ‘कृषि मॉडल’ इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है? यदि मंत्री जी अपने घर के पिछवाड़े हो रही अवैध गतिविधियों से अनजान हैं, तो फिर पूरे प्रदेश की कृषि व्यवस्था की निगरानी का उनका दावा कितना खोखला है, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। यह सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि उन दावों की पोल है जो सुशासन और ‘जीरो टॉलरेंस’ के नाम पर किए जाते हैं।
उम्मीद है कि अगली बार जब मंत्री जी किसानों को ‘फसल विविधीकरण’ की सलाह देंगे, तो वह अफीम को उस सूची से बाहर रखने की याद जरूर रखेंगे। फिलहाल तो बलरामपुर के इन खेतों ने सरकार के चेहरे पर जो ‘लाली’ बिखेरी है, वह अफीम के फूलों से भी ज्यादा सुर्ख है।

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