कलेक्टर ने जिस आवेदन को किया था खारिज, जांच लंबित होने के बावजूद संभाग आयुक्त ने दी हरी झंडी; पटवारी की भूमिका भी संदिग्ध…

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कोरवा जनजाति की जमीन पर प्रशासनिक ‘खेल’, 5 बच्चों के पिता को ‘निसंतान’ बताकर कमिश्नर कार्यालय से दिलाई बिक्री की अनुमति…..

हिंद स्वराष्ट्र सूरजपुर/लटोरी : छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले में विशेष संरक्षित पहाड़ी कोरवा जनजाति की जमीन की खरीद-बिक्री को लेकर एक बड़ा घोटाला सामने आया है। प्रशासन की नाक के नीचे भू-माफियाओं और राजस्व अमले की मिलीभगत का ऐसा खेल खेला गया है, जिसमें एक जीवित और भरे-पूरे परिवार वाले आदिवासी शख्स को सरकारी दस्तावेजों में ‘निसंतान’ घोषित कर दिया गया। ताज्जुब की बात यह है कि इस विवादित जमीन की बिक्री की अनुमति सरगुजा संभाग आयुक्त (कमिश्नर) कार्यालय से दे दी गई है, जबकि सूरजपुर कलेक्टर ने पूर्व में इस परमिशन के आवेदन को कड़ाई से खारिज कर दिया था। वहीं इस जमीन में राजस्व रिकॉर्ड में छेड़छाड़ के आरोप की जांच अनुविभागीय अधिकारी राजस्व के यहां लंबित हैं।

पटवारी की फर्जी रिपोर्ट और साजिश :
मिली जानकारी के अनुसार, जिस पहाड़ी कोरवा आदिवासी की जमीन की सौदेबाजी की जा रही है, वह वास्तविक जीवन में 5 बच्चों का पिता है। लेकिन क्षेत्र के पटवारी ने अपनी राजस्व रिपोर्ट में उसे ‘निसंतान’ दर्शाया है। जानकारों का कहना है कि यह फर्जीवाड़ा इसलिए किया गया ताकि यह दिखाया जा सके कि संबंधित आदिवासी का कोई कानूनी वारिस नहीं है और जमीन आसानी से गैर-आदिवासियों या रसूखदारों को बेची जा सके।

कलेक्टर की ‘ना’ के बाद कमिश्नर की ‘हां’ पर उठे सवाल:

इस मामले में प्रशासनिक विरोधाभास ने सबको चौंका दिया है। सूत्रों के मुताबिक, सूरजपुर कलेक्टर ने जमीन की प्रकृति और आदिवासियों के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए बिक्री की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। नियमतः पहाड़ी कोरवाओं की जमीन की बिक्री के लिए कड़े प्रावधान हैं। कलेक्टर की अस्वीकृति के बाद यह मामला कमिश्नर कार्यालय पहुंचा, जहां से इसे बिक्री की मंजूरी मिल गई। सवाल यह उठ रहा है कि क्या कमिश्नर कार्यालय ने कलेक्टर के आदेश और पटवारी की संदिग्ध रिपोर्ट की जांच करना जरूरी नहीं समझा?

जांच अभी भी लंबित:

हैरानी की बात यह भी है कि उक्त जमीन को लेकर वर्तमान में एसडीएम (SDM) कार्यालय में जांच प्रक्रिया लंबित है। नियमानुसार, जब किसी संपत्ति या व्यक्ति की स्थिति पर जांच चल रही हो, तो उसकी बिक्री या हस्तांतरण की अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन यहां जांच पूरी होने का इंतजार किए बिना ही फाइल को मंजूरी दे दी गई।

आदिवासी अधिकारों का हनन:

पहाड़ी कोरवा जनजाति को राष्ट्रपति का ‘दत्तक पुत्र’ माना जाता है और उनकी जमीन की सुरक्षा के लिए विशेष कानून हैं। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भू-माफिया किस कदर सरकारी तंत्र में पैठ बना चुके हैं कि वे एक पिता के अस्तित्व और उसके बच्चों के हक को कागजों पर मिटाने की हिम्मत रखते हैं।

मुख्य सवाल जो जवाब मांगते हैं

* पटवारी ने किस आधार पर 5 बच्चों के पिता को ‘निसंतान’ बताया? क्या उस पर कोई दंडात्मक कार्रवाई होगी?
* एसडीएम कोर्ट में जांच लंबित होने के दौरान बिक्री की अनुमति कैसे जारी हुई?
* कलेक्टर द्वारा खारिज आवेदन पर कमिश्नर कार्यालय ने किन तथ्यों के आधार पर सहमति दी?

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