हिंद स्वराष्ट्र अम्बिकापुर : कल संसद में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा बजट पेश किया गया जिसे लेकर प्रतिक्रियाओं का सिलसिला लगातार जारी है। इसी क्रम में अमित तिवारी कांग्रेस व्यापार प्रकोष्ठ के जिलाध्यक्ष ने बजट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस सत्र में प्रस्तुत किए गए बजट को देखकर एसा महसूस हो रहा है कि मोदी सरकार के पास अब नए आइडिया खत्म हो गए हैं। ये बजट भारत की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों के लिए एक सवाल लेकर आया है। इस बजट में गरीब और निचले तबके के लिए कुछ भी नहीं है। इस महत्वपूर्ण बजट में देश की बढती महंगाई को नियंत्रित करने के लिए भी कोई कदम नहीं उठाए गए हैं। इकॉनमिक सर्वे दिखाता है कि व्यापार में अनिश्चितता भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है, लेकिन प्रस्तुुत बजट इस समस्या को पूर्ण रूप से नजरअंदाज कर रहा है।
रुपए की गिरावट से निपटने के लिए भी सरकार के पास कोई योजना नहीं है। भारतीय अर्थव्यवस्था का मूल संकट ठहरा हुआ वेतन, कमजोर उपभोक्ता मांग और निजी निवेश में सुस्ती है, लेकिन बजट में उपभोक्ता मांग को गति देने का कोई विचार नहीं दिखता है। वहीं, इस बजट में कर्ज के बढ़ते बोझ पर भी ध्यान नहीं दिया गया है।
इस बजट में शिक्षित युवाओं में फैले व्यापक बेरोजगारी संकट के समाधान से जुड़ी कोई बात नहीं है। साथ ही गंभीर वित्तीय दबाव में चल रही राज्य सरकारों को कोई राहत देते नहीं दिख रही हैं। असमानता ब्रिटिश राज के दौर को पार कर गई है, लेकिन बजट में इसका जिक्र तक नहीं किया गया है। इसके साथ ही SC-ST, पिछड़े वर्ग, EWS या अल्पसंख्यकों के लिए किसी प्रकार की सहायता का प्रावधान नहीं किया गया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार मौजूदा मोदी सरकार ने पिछले साल के आवंटित बजट में शिक्षा, स्वास्थ्य, सोशल जस्टिस जैसे कई जरूरी क्षेत्रों में पूरा बजट भी खर्च नहीं किया।
मोदी सरकार का नारा है- ‘सबका साथ, सबका विकास’, लेकिन बजट के आंकड़े दिखाते हैं कि शिक्षा में पैसा खर्च नहीं किया और बजट भी पिछले साल के मुकाबले घटा दिया गया।
पहले की सरकारें शिक्षा, स्वास्थ्य और छात्रों को स्कॉलरशिप पर ज्यादा जोर देती थीं। वित्त मंत्री ने एक भी बार स्कूलों का जिक्र नहीं किया और सामाजिक सुरक्षा और कल्याण को लेकर एक भी घोषणा नहीं की। इसके अलावा, मनरेगा की जगह आए नए कानून के बजट के बारे में कोई जिक्र नहीं किया गया।
ये एक थकी हुई और रिटायर हो चुकी सरकार का बजट है। पहले तो ये पैसा नहीं देना चाहते और ऊपर से मिले बजट को भी खर्च नहीं करते हैं।
नरेंद्र मोदी गुड गवर्नेंस की बात करते हैं लेकिन वे लोगों की भलाई के लिए कोई कदम नहीं उठाना चाहते। ये लोगों के हित में नहीं है और इसका लोगों के लिए कोई उपयोग नहीं है।
और तो और मोदी सरकार के इस बजट की घोषणा के बाद शेयर मार्केट गिर गया। हर क्षेत्र में यह सरकार विफल हो चुकी है। यह बजट गरीबों, युवाओं और किसानों के हित में नहीं है। महंगाई कैसे कम होगी, रोजगार कैसे पैदा होंगे, इसका कोई उल्लेख नहीं किया गया है।
आखिर क्या कारण है कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं लगातार अपना निवेश भारतीय बाजार से निकाल रही हैं। मौजूदा मोदी सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नए निवेशकों को लुभाने में पूर्ण रूप से विफल साबित हो रही है।
इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि किसानों की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर गारंटी कानून की प्रमुख मांग को बजट में शामिल नहीं किया गया है। किसान सम्मान निधि को बढ़ाकर 12,000 रुपये किए जाने की उम्मीद थी, जो इस बजट में दिखाई नहीं दी। यह किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण वित्तीय सहायता होती, परंतु इसको पूर्णत: नजरअंदाज किया गया।
बजट में निजी स्कूलों को बढ़ावा देने की बात पर भी सवाल उठना चाहिए। इससे सरकारी स्कूलों के बंद होने का खतरा बढ़ सकता है, जिसका सीधा और नकारात्मक प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों पर पड़ेगा। यह मुद्दा ग्रामीण शिक्षा प्रणाली की मजबूती को लेकर नई चिंताएं पैदा करता है।
शेेयर बाजार में इंट्राडे ट्रेडिंग शुल्क में वृद्धि कर सरकार द्वारा पहले ही निवेशकों की कमर तोड दी गई है। शुल्क अब इक्विटी में बिक्री पक्ष पर 0.025% हो गया है। इसके अतिरिक्त, ब्रोकरेज (आमतौर पर ₹20 या 0.01-0.05%), 18% जीएसटी, और एक्सचेंज ट्रांजैक्शन चार्ज (NSE/BSE) कुल लागत को और बढ़ा देते हैं। 3:20 बजे के बाद स्वचालित स्क्वायर-ऑफ पर प्रति पोजीशन ₹50+GST लग सकता है। इससे वैसे भी निवेशक निराश थे जिसके फलस्वरूप शेयर बाजार में लगातार गिरावट देखी जा रही है।
इस बजट में देश को नई दिशा देने का काम किया जाना चाहिए था, मगर वो नहीं हुआ। यहां तक कि मोदी सरकार ने अपने वादों को भी नकार दिया।
एसे बजट से आम जनता एवं मध्यम वर्ग के व्यापारियों को सिर्फ और सिर्फ निराशा ही हाथ लगी है।

